Friday, August 19, 2016

101 किताबें शायरी की ...में 'जन-गण-मन' पर प्रख्यात ग़ज़लकार व समीक्षक श्री नीरज गोस्वामी का आलेख


101 किताबें शायरी की ...में 'जन-गण-मन' पर प्रख्यात ग़ज़लकार व समीक्षक श्री नीरज गोस्वामी



भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार...ये शब्द आजकल हर तरफ गूँज रहा है...सदियों से सहते आ रहे भ्रष्टाचार से अचानक लोग मुक्ति पाने के लिए तड़प रहे हैं...नारे लगा रहे हैं, अनशन कर रहे हैं, मुठ्ठियाँ हवा में लहरा रहे हैं...और भ्रष्टाचार है के वहीँ का वहीँ अपनी मजबूत स्तिथि का फायदा उठाते हुए मंद मंद मुस्कुरा रहा है. क्यूँ? जवाब के लिए मुंबई से प्रकाशित साहित्य पत्रिका "कथा बिम्ब" के ताज़ा अंक में "श्री घनश्याम अग्रवाल" जी की ये कविता पढ़ें:
"बेताल के सवाल पर 
विक्रम से लेकर अन्ना तक 
सभी मौन हैं
कि जब सारा देश
भ्रष्टाचार के खिलाफ है 
तब साला भ्रष्टाचार करता कौन है?"
सीधी सी बात है भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हम लोग ही भ्रष्टाचार को फ़ैलाने में सहयोग देते हैं.इसी बात को उस शायर ने जिसकी किताब का जिक्र हम करने जा रहे हैं किस खूबसूरत अंदाज़ में कहा है पढ़िए :
ये चाँद ख़ुद भी तो सूरज के दम से काइम हैं 
ये ख़ुद के बल पे कभी चांदनी नहीं देते
गज़ब के तेवर लिए इस छोटी सी प्यारी सी शायरी की किताब " जन गण मन " के लेखक हैं ब्लॉग जगत के अति प्रिय, स्थापित युवा शायर जनाब "द्विजेन्द्र द्विज" साहब. द्विजेन्द्र जी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं ,ब्लॉग जगत के ग़ज़ल प्रेमी इस नाम से बखूबी परिचित हैं. ब्लॉग पर उनकी सक्रियता अधिक नहीं रहती लेकिन वो जब भी अपनी ग़ज़लों से रूबरू होने का मौका देते हैं अपने पाठकों को चौंका देते हैं.
अँधेरे चंद लोगों का अगर मकसद नहीं होते 
यहां के लोग अपने आप में सरहद नहीं होते

फरेबों की कहानी है तुम्हारे मापदंडों में
          वगरना हर जगह 'बौने' कभी 'अंगद' नहीं होते

चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा 
सफ़र में हर जगह सुन्दर घने बरगद नहीं होते
बौनों के अंगद होने की बात कहने वाला शायर किस कोटि का होगा ये पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है. ऐसी सोच और ऐसे अशआर यक़ीनन शायर के अन्दर धड़कते गुस्से के लावे को बाहर लाते हैं. द्विज जी की बेहतरीन ग़ज़लें रिवायती ग़ज़लों की श्रेणी में नहीं आतीं, उनकी ग़ज़लों में महबूबा के हुस्न और उसकी अदाओं में घिरे इंसान का चित्रण नहीं है उनकी ग़ज़लों में आम इंसान की हताशा, दुखी जन के प्रति संवेदनाएं और समाज के सड़े गले नियमों के खिलाफ गुस्सा झलकता है. द्विज जी अपनी ग़ज़लों से आपको झकझोर कर जगाते हैं:
अगर इस देश में ही देश के दुश्मन नहीं होते
           लुटेरा ले के बाहर से कभी लश्कर नहीं आता
जो खुद को बेचने की फितरतें हावी नहीं होतीं
हमें नीलाम करने कोई भी तस्कर नहीं आता
अगर जुल्मों से लड़ने की कोई कोशिश रही होती 
हमारे दर पे जुल्मों का कोई मंज़र नहीं आता
10 अक्तूबर,1962. को जन्में द्विज जी, बेहतरीन ग़ज़ल कहने की उस पारिवारिक परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं जिसकी नींव उनके स्वर्गीय पिता श्री "सागर पालमपुरी" जी ने डाली थी. श्री ‘सागर पालमपुरी’ जी का नाम आज भी हिमाचल के साहित्यिक हलकों बहुत आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है. कालेज के दिनों से ही वो अपने पिता के सानिध्य में ऐसी ग़ज़लें कहने लगे जिसे सुन कर उस्ताद शायर भी दंग हो जाया करते थे. तारीफों की हवा से अक्सर इंसान गुब्बारे की तरह अपनी ज़मीन को छोड़ कर ऊपर उड़ने लगते हैं और एक दिन अचानक धरातल पर आ गिरते हैं, लेकिन द्विज जी के साथ ऐसा नहीं हुआ. प्रशंसा की सीढियों से उन्होंने नयी ऊँचाइयाँ छूने की कोशिशें की:
कटे थे कल जो यहाँ जंगलों की भाषा में 
उगे हैं फिर वही तो चम्बलों की भाषा में
सवाल ज़िन्दगी के टालना नहीं अच्छा 
दो टूक बात करो, फ़ैसलों की भाषा में 
फ़रिश्ता है कहीं अब भी जो बात करता है 
कड़कती धूप तले, पीपलों की भाषा में
           हज़ार दर्द सहो, लाख सख्तियां झेलो
         भरो न आह मगर, घायलों की भाषा में

द्विज जी चूँकि हिमाचल से हैं इसलिए उनकी ग़ज़लों में पहाड़ नदियाँ बादल झरने रूमानी अंदाज़ में नहीं बल्कि ज़िन्दगी की हकीकत बन कर कर उभरे हैं. इस संग्रह की संक्षिप्त सी भूमिका में मशहूर ग़ज़ल कार जनाब 'ज़हीर कुरैशी' जी ने क्या खूब लिखा है के " द्विज जी की ग़ज़लों में व्यक्त उनका पहाड़ हिमाचल तक सीमित नहीं है. जाति मज़हब रंग नस्लों और फिरकापरस्ती की सियासत के खिलाफ भी उनका ग़ज़लकार तन कर खड़ा है. पहाड़ की कठिन ज़िन्दगी में खून-पसीने से सींचे गए खेतों की उपज का बंटवारा ठीक-ठाक होने की चेतावनी भी उनके शेरों में है." आप खुद पढ़ें:
बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
खिड़कियाँ हो हर तरफ ऐसी दुआ लिखते हैं हम
आदमी को आदमी से दूर जिसने कर दिया
          ऐसी साजिश के लिए हर बद्दुआ लिखते हैं हम

रौशनी का नाम दे कर आपने बाँटे हैं जो
उन अंधेरों को कुचलता हौसला लिखते हैं हम
अँग्रेज़ी साहित्य में सनातकोत्तर डिग्री प्राप्त द्विज जी राजकीय पॉलीटेक्निक, सुन्दर नगर , जिला मंडी में विभागाध्यक्ष अनुप्रयुक्त विज्ञान एवं मानविकी के पद पर कार्य रत हैं , ग़ज़ल लेखन उनका शौक भी है और समाज में हो रही असंगतियों को देख मन के अन्दर उठते लावे को बाहर लाने का ज़रिया भी. उनकी ग़ज़लें आपसे दार्शनिक अंदाज़ में बातें नहीं करती बल्कि सीधे सपाट शब्दों में अपनी बात कहती हैं और अपना पक्ष प्रस्तुत करती हैं:
आपके अंदाज़, हमसे पूछिए तो मोम हैं
          अपनी सुविधा के सभी सांचों में ढल जाते हैं आप

कुश्तियां, खेलों के चस्के आपके भी खूब हैं
          शेर बकरी को पटकता है बहल जाते हैं आप

सिद्धियाँ मिलने पे जैसे मन्त्र साधक मस्त हों
           शहर में होते हैं दंगे, फूल फल जाते हैं आप

"जन-गण-मन" गागर में सागर को चरितार्थ करती हुई छोटी सी किताब है जिसमें द्विज जी की लगभग साठ ग़ज़लें संगृहीत हैं. इसे आप श्री सतपाल ख्याल जी के ब्लॉग "आज की ग़ज़ल" या फिर स्वयं द्विज जी के ब्लॉग "द्विजेन्द्र ‘द्विज’" पर आन लाइन भी पढ़ सकते हैं. लेकिन साहब आन लाइन पढने में वो मज़ा नहीं आता जो मज़ा किताब को हाथ में उठाकर पढने में आता है. हालाँकि इस किताब को 'दुष्यंत-देवांश-प्रकाशन, अशोक लॉज, मारण्डा, हिमाचल प्रदेश द्वारा प्रकाशित किया गया है लेकिन इसे प्राप्त करने का आसान तरीका है द्विज जी को इस संग्रह के लिए उनके मोबाइल +919418465008 पर बात कर बधाई देते हुए उनसे किताब की प्राप्ति के लिए आग्रह करना। मेरा सौभाग्य है के मैं पिछले पांच सालों से उनसे संपर्क में हूँ .ये संपर्क अभी तक आभासी है याने सिर्फ मोबाइल पर ही उनसे बात होती है लेकिन मुझे उनसे बात करके कभी लगा ही नहीं कि मैं इनसे अभी तक नहीं मिला हूँ. मैंने ग़ज़ल लेखन के क्षेत्र में उनसे बहुत कुछ सीखा है और सीख रहा हूँ. इस क्षेत्र में आदरणीय पंकज सुबीर जी और प्राण साहब के साथ साथ वो भी मेरे गुरु हैं. अपनी सोच में एकदम स्पष्ट और जीवन के प्रति सकारात्मक विचार रखने वाले इस शख्श की प्रशंशा के लिए मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं. मैं दुआ करता हूँ के वो इसी तरह अपनी शायरी से हमें हमारे जीवन में फैले अंधियारों से लड़ने की ताकत देते रहें:
रास्तों पर 'ठीक शब्दों' के 
 दनदनाती ' वर्जनाएं ' हैं
          मूक जब 'संवेदनाएं' हैं
           सामने 'संभावनाएं' हैं 

          आदमी के रक्त में पलतीं 
          आज भी 'आदिम-प्रथाएं' हैं

             ये मनोरंजन नहीं करतीं
           क्यूंकि ये ग़ज़लें 'व्यथाएं' हैं

Sunday, February 19, 2012

पहाड़ी कवि की पुकार- ‘जन-गण-मन’

द्विजेंद्र द्विज के “जन- गण - मन” पर प्रख्यात समीक्षक श्री चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद

पहाड़ी कवि की पुकार- ‘जन-गण-मन’

“ये मनोरंजन नहीं करती
क्योंकि ये ग़ज़लें व्यथाएँ हैं"


हिन्दी ग़ज़ल की यात्रा अमीर ख़ुसरो से शुरू होते हुए भारतेन्दु, बद्री नारायण चौधरी, प्रताप नारायण मिश्र, नाथू राम शर्मा ‘शंकर’, जयशंकर प्रसाद,निराला, शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन,,जानकी वल्लभ शास्त्री, बलबीर सिंह ‘रंग’ आदि अनगिनत कवियों की कलम से रवाँ होती गई और आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल की दूसरी पारी दुष्यन्त कुमार की हुई। आज की हिन्दी ग़ज़ल उर्दू के हुस्नो-इश्क़ और जामो-मीना को छोड़कर काफ़ी आगे निकल गई है।

“ जो हुस्नो-इश्क़ की वादी से जा सके आगे
ख़याले-शायरी को वो उड़ान दीजिएगा । "

आजकी ग़ज़ल मानव की समस्याओं और संवेदनाओं को बयाँ करती है। कभी-कभी इन्हीं पहलुओं पर अपने तेवर दिखाते हुए शायरी ‘तेवरी’ का रूप भी धर लेती है ।

‘मत बातें दरबारी कर
सीधी चोट करारी कर’


द्विजेंद्र द्विज आजके ऐसे ग़ज़लगो हैं जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों तक पहुँचते रहे हैं। अब उनक पहला ग़ज़ल संग्रह “जन-गण-मन” पाठकों के बीच आया है जिसमें छप्पन ग़ज़लें संकलित हैं।

“मन ख़ाली हैं
लब जन-गण-मन’’

``निर्वासित है
क्यों जन-गण-मन"


‘द्विज’ वो पहाड़ी कवि हैं जिन्होंने अपने जीवन की चौथाई सदी मारंडा (पालमपुर) रोहड़ू ,हमीरपुर, कांगड़ा और धर्मशाला जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में गुज़ार दी । यद्यपि वे अ~म्ग्रेज़ी के प्राध्यापक हैं परन्तु अपने जज़्बात को बयाँ करने के लिए उन्होंने उन्होंने ग़ज़ल को अपना माध्यम बनाया है।

“ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़
लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेहरबाँ पहाड़ ”


लेकिन जब इन सुन्दर मेहरबान पहाड़ों को मानव प्रदूषित करता है,तब भी वे अपने सत्कार की परंपरा को नहीं भूलते ।

“कचरा व प्लास्टिक मिले उपहार में इन्हें
सैलानियो के ‘द्विज’ हुए हैं मेज़बाँ पहाड़”


आजका कोई भी साहित्यकार जीवन के गिरते मूल्यों पर चिंता व्यक्त करने से नहीं चूकता। ‘द्विज’ ने भी “जन-गण-मन” में समाज के पतन पर चिंता व्यक्त की है। यद्यपि इस मुद्दे पर हर कोई बात करता है परंतु इसे अमली जामा कौन पहनाएगा?

“तहज़ीब यह नई है इसको सलाम कहिये
रावण जो सामने हों उनको भी राम कहिये”


“बहस के मुद्दओं में मौलवी थे पंडित थे
वहाँ ‘द्विज’ आदमी का ही निशाँ नहीं देखा”



जिन्हें सरपरस्त समझकर देश की बागडोर हम थमाते हैं वे भी झूठे आश्वासन दे कर अपनी राजनीति चलाते हैं।

“आश्वासन, भूख,बेकारी, घुटन, धोखाधड़ी
हाँ, यही सब तो दिया है आपके विश्वास ने”

राजनीति का एक और शस्त्र बन गया है मज़हब,जिसके कारन न सिर्फ़ देश का बँटवारा हुआ, बल्कि मासूम लोगों का ख़ून भी बस्तियों में बह रहा है।

“फिर से ख़ंजर थाम लेंगी हँसती-गाती बस्तियाँ
जब नए दंगों का फिर वो मुद्दआ दे जाएगा”

यदि कुछ समाज सेवी इन दंगों का हल निकालना भी चाहें तो राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले इसे ख़त्म नहीं होने देते हैं।

“जमीं हैं हर गली में ख़ून की देखो कई पर्तें
मगर दंगे कभी इनको तुम्हें धोने नहीं देंगे”

“ नीयत न साफ़ और थी न जब ज़बान साफ़
होता भी कैसे आपका कोई बयान साफ़”

देश के लोग ग़रीबी की चक्की में पिस रहे हैं रोटी, कपड़ा और मकान पर नेता रात-दिन भाषण देते हैं परन्त आज भी कवि उनसे यही माँग करता है:

‘‘जो छत हमारे लिए भी कोई दिला पाए
हमें भी ऐसा कोई संविधान दीजिएगा”

‘द्विज’ ने साहित्य में फैल रहे “प्रदूषण" पर भी चिंता व्यक्त की है। जिस प्रकार शिक्षा क्षेत्र में राजनीति की जा रही है या पुरस्कारों की होड़ में उठा-पटक चल रही है, उसपर भी ‘द्विज’ ने कलम चलाई है ।

“पृष्ठ तो इतिहास के जन-जन को दिखलाए गए
ख़ास जो संदर्भ थे केवल वो झुठलाए गए"

हुनर तो था ही नहीं उनमें जी हुज़ूरी का
इसीलिए तो ख़िताबों से दूर रक्खे गए”

द्विजेंद्र ‘द्विज’ उन ग़ज़लकारों में से एक हैं जिन्होंने दुष्यन्त की लीक पर चलते हुए हिन्दी और उर्दू को एक सूत्र में बाँधा है। ज़हीर क़ुरेशी ने इस पुस्तक की भूमिका में सही कहा है :

“भाषाई स्तर पर द्विजेंद्र ‘द्विज’ दुष्यन्त कुल के ग़ज़लकार हैं, हिन्दी और उर्दू के बीच संतुलन कायम करने वाले । द्विजेंद्र की ग़ज़लों का भाषाई लहजा सादा और साफ़ है....जहाँ तक शेरों में पसरी गई विषय वस्तु का सवाल है तो ‘द्विज’ का कैन्वास काफ़ी विस्तृत है।”

जन-गन-मन के अशआर पढ़ते हुए पाठक का एक-एक शे‘र पर दाद देने को मन चाहेगा । आशा है , इस ग़ज़लकार के प्रथम संकलन को वही सम्मान मिलेगा जो किसी भी मंझे हुए शायर के संग्रह को मिलता है।
---- चन्द्र मौलेश्वर प्रसाद
1-8-28, यशवंत भवन, अलवाल,
सिकन्दराबाद -500010(आं.प्र.)


साभार:

सहकारी युग (साप्ताहिक) दिनांक 25 अक्तूबर,2004 (संपादक नीलम गुप्ता, B-ब्लॉक,26/27,अब्बास मार्केट, रामपुर-244901)

Friday, February 17, 2012

जन-गण-मन की तीसरी ग़ज़ल

जन-गण-मन की तीसरी ग़ज़ल

बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
खिड़कियाँ हों हर तरफ़ ऐसी दुआ लिखते हैं हम

आदमी को आदमी से दूर जिसने कर दिया
ऐसी साज़िश के लिए हर बद्दुआ लिखते हैं हम

जो बिछाई जा रही हैं ज़िन्दगी की राह में
उन सुरंगों से निकलता रास्ता लिखते हैं हम

रोशनी का नाम देकर आपने बाँटे हैं जो
उन अँधेरों को कुचलता हौसला लिखते हैं हम

ला सके सबको बराबर मंज़िलों के रास्ते
हर क़दम पर एक ऐसा क़ाफ़िला लिखते हैं हम

सादर
द्विजेन्द्र द्विज

Friday, October 14, 2011

जन-गण -मन की दूसरी ग़ज़ल

आदरणीय व प्रिय मित्रो!

बहुत दिनों से नई पोस्ट नहीं लगा पाया था.

संकलन जन-गण-मन की दूसरी ग़ज़ल प्रस्तुत है.



अँधेरे चन्द लोगों का अगर मक़सद नहीं होते
यहाँ के लोग अपने-आप में सरहद नहीं होते

न भूलो, तुमने ये ऊँचाईयाँ भी हमसे छीनी हैं
हमारा क़द नहीं लेते तो आदमक़द नहीं होते

फ़रेबों की कहानी है तुम्हारे मापदण्डों में
वगरना हर जगह बौने कभी अंगद नहीं होते

तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी भला कब तक
वहाँ पर भी बसेरे हैं जहाँ गुंबद नहीं होते

चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा
सफ़र में हर जगह सुन्दर-घने बरगद नहीं होते

सादर
द्विजेन्द्र द्विज

Sunday, June 27, 2010

ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़

ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़
लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेहरबाँ पहाड़

हैं तो बुलन्द हौसलों के तर्जुमाँ पहाड़
पर बेबसी के भी बने हैं कारवाँ पहाड़

थी मौसमों की मार तो बेशक बडी शदीद
अब तक बने रहे हैं मगर सख़्त-जाँ पहाड़

सीने सुलग के हो रहे होंगे धुआँ-धुआँ
ज्वालामुखी तभी तो हुए बेज़बाँ पहाड़

पत्थर-सलेट में लुटा कर अस्थियाँ तमाम
मानो दधीचि-से खड़े हों जिस्मो-जाँ पहाड़

नदियों,सरोवरों का भी होता कहाँ वजूद
देते न बादलों को जो तर्ज़े-बयाँ पहाड़

वो तो रहेगा खोद कर उनकी जड़ें तमाम
बेशक रहे हैं आदमी के सायबाँ पहाड़

सीनों से इनके बिजलियाँ,सड़कें गुज़र गईं
वन, जीव, जन्तु, बर्फ़, हवा, अब कहाँ पहाड़

कचरा,कबाड़,प्लास्टिक उपहार में मिले
सैलानियों के ‘द्विज’, हुए हैं मेज़बाँ पहाड़

Tuesday, June 22, 2010

एक सजग रचनाकार की संघर्ष चेतना का प्रतिरोधात्मक प्रतिज्ञापत्र

द्विज के ‘जन-गण-मन’ पर प्रख्यात समालोचक नचिकेता की समीक्षा

‘जन-गण-मन‘ द्विजेन्द्र द्विज की बेहतरीन छ्प्पन गज़लों का पहला संग्रह है। द्विजेन्द्र ‘द्विज’ उन गज़लकारों में से महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं जिन्हें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के जरिए इस पहले गज़ल संग्रह के प्रकाशन के पूर्व ही स्थापित ग़ज़लकार का दर्ज़ा मिल चुका है। दरअसल द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लों की बनावट और बुनावट अपने समकालीनों से बिल्कुल अलहदा है। द्विज के पास समकालीन यथार्थ की बहुस्तरीय संश्लिष्टता सार्थक अभिव्यक्ति देने में सक्षम भाषा है,जिसमें बिम्ब,प्रतीक और संकेतों के समन्वय और सामंजस्य की सघनता है। इसके बावजूद कहीं भी अमूर्त्तनता या अर्थहीनता का आभास नहीं मिलता।

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ के पास अपने समय और समाज के अंतर्विरोधों की भीतरी परतों को भी एक्स-रे की तरह परखने वाली सूक्षम अंतर्दृष्टि है। अपने समय की लहुलुहान हकीकत को उसमें संपूर्ण जटिलता में समग्रता के साथ व्यक्त करने की चुनौती स्वीकार करने में द्विजेन्द्र द्विज की गज़लों को कोई हिचक महसूस नहीं होती। परिणामत: उनकी ग़ज़लों से व्यापक मध्यवर्गीय जन-जीवन की त्रासदियों सामाजिक अंतर्विरोधों,राजनीतिक विसंगतियों आर्थिक असमानताओं मूल्य विघटन और सांस्कृतिक अवमूल्यन के कारणों को परखने में कोई चूक नहीं होती:

"आँखों पर बाँधी गईं ऐसी अँधेरी पट्टियाँ
घाटियों के सब सुनहरे दृश्य धुँधलाए गए

घाट था सब के लिए पर फिर भी जाने क्यों वहाँ
कुछ प्रतिष्ठित लोग ही चुन -चुन के नहलाए गए

जब कहीं ख़तरा नहीं था आसमाँ भी साफ़ था
फिर परिंदे क्यों वहाँ सहमे हुए पाए गए"

अथवा

"सर से पाँवों तक अब भी हम भीगे हैं
कैसे छप्पर, कैसे उनके छाते हैं

सूखे में बरसात की बातें करते हैं
फिर भी पानी से वो क्यों डर जाते हैं"


रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हम रोज़ देखते हैं कि हमारे सियासी रहनुमा हमें मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखला कर बहलाया करते हैं और हमें उनके शोषण के नापाक इरादों का पता तब चलता है जब हमारी साँसों में ताज़ा हवा की जगह कड़वा धुआँ भर जाता है। शोषक शासक वर्ग की इन रेशमी मगर ख़तरनाक हरकतों को द्विज की ग़ज़लें बेलौस ढंग से बेनक़ाब करती हैं:

"चंद ख्वाबों को हक़ीक़त में बदलने के लिए
कितने ख़्वाबों का वहाँ ग़बन होता है

जब धुआँ साँस की चौखट पे ठहर जाता है
तब हवाओं को बुलाने का जतन होता है

या

तुम्हारे आँसुओं को सोख लेगी आग दहशत की
तुम्हें पत्थर बना देंगे तुम्हें रोने नहीं देंगे

घड़ी भर के लिए जो नींद मानों मोल भी ले ली
भयानक ख़वाब तुमको चैन से सोने नहीं देंगे ."

आज की उपभोक्तावादी संस्कृति का सबसे ज़्यादा आक्रमण संवेदना पर ही हुआ है।संवेदन शून्य आत्मपरकता और स्वार्थपरकता की ऐसी भयानक आँधी चली है कि पूरी सदी ही पथरा गई-सी दृष्टिगोचर होती है। संवेदनहीन, स्पंदनविहीन इस अमानवीय यातनागृह से छुटकारा पाने की छटपटाहट द्विजेन्द्र द्विज की इन ग़ज़लों में शिद्दत के साथ और मार्मिक ढंग से मुखरित हुई है:

"ज़ख़्म तू अपने दिखाएगा भला किसको यहाँ
यह सदी पत्थर-सी है, संवेदनाओं के ख़िलाफ़

ठीक भी होता नहीं मर भी नहीं पाता मरीज़
कीजिए कुछ तो दवा ऐसी दवाओं के ख़िलाफ़"


निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि द्विजेन्द्र द्विज मौजूदा दौर के सामाजिक यथार्थ और उसके अंतर्विरोधों की भीतरी परतों को सिर्फ़ उघारते भर नहीं अपितु नई समाज रचना के लिए संघर्षशील आवाम को एकजुट संघर्ष के वास्ते लामबद्ध करते हैं।इस लिए इनकी ग़ज़लों में ऐसा बहुत कुछ नवीन और मौलिक है जो केवल नएपन के इज़हार के लिए नहीं बल्कि अपने सामाजिक अनुभव को राजनीतिक विमर्श की शक्ल देने के सार्थक प्रयास का नतीजा मालूम होता है। अतएव द्विजेन्द्र द्विज की सार्थक ग़ज़लें अपने पाठकों की संवेदना के कोमल तंतुओं को केवल सहलाती, गुदगुदाती और रोमांचित ही नहीं करतीं प्रत्युत बेचैन भी करती हैं:

" जिया झुका के जो सर ज़िल्लतों में, ज़ुल्मों में
न हो वो क़त्ल कोई बेज़ुबाँ नहीं देखा

पिलाएगा तुझे पानी जो तेरे घर आकर
अभी किसी ने भी ऐसा कुआँ नहीं देखा"

अथवा

"धूप ख़यालों की खिलते ही वो भी आख़िर पिघलेंगे
बैठ गए हैं जमकर जो हिमपात हमारी यादों में

सह जाने का चुप रहने का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं
पलता नहीं है कोई भी प्रतिघात हमारी यादों में"

द्विजेन्द्र द्विज की ग़ज़लें, दरहक़ीक़त,समकालीन सामाजिक राजनीतिक वातावरण पर एक सजग रचनाकार की संघर्ष चेतना का प्रतिरोधात्मक प्रतिज्ञापत्र हैं \ कहीं यह आईना दिखाती हैं तो कहीं मुँह चिढ़ाती प्रतीत होती हैं कहीं पीड़ा है तो कहीं आक्रोश भी है। ये ग़ज़लें कही चेतावनी देती हैं तो कहीं चुनौती। कहीं अपील करती महसूस होती हैं तो कहीं संघर्ष का आह्वान करती।कहीं फटकार है तो कहीं दिलासा। कहीं सलाह है तो कहीं संवाद। कहीं रचनाकार का आत्मकथ्य नज़र आती हैं तो कहीं वक्तव्य भी। इन्हीं द्वन्द्वात्मक अंतर्विरोधों/मनस्थितियों की खुरदरी ज़मीन पर खड़ी हो कर द्विजेन्द्र द्विज की ग़ज़लें अपने समय और समाज को और अधिक मनवीय बनाने के निमित्त संघर्षरत हैं ख़ूबसूरत अंदाज़े- बयाँ में नुमाया द्विजेन्द्र द्विज की ग़ज़लों की वैचारिक अंतर्वस्तु जितनी पुख़्ता और मज़बूत है, प्रभावी अंतर्वस्तु फाँक भी उतनी ही अधिक चौड़ी है।


साभार: कृष्णानंद कृष्ण के संपादन में पटना से प्रकाशित पत्रिका पुन: (अंक-१५, नवम्बर-२००३)

Thursday, June 3, 2010

सच्चे गीत उल्लास के

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ के ग़ज़ल संकलन जन-गण-मन पर डा० आत्मा राम (प्रख्यात समालोचक, शिक्षाविद, व्यंग्यकार,तथा पूर्व शिक्षा निदेशक हिमाचल प्रदेश)


द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लें सरल भाषा में तीखे और कारगर भाषा में सीधे तीर के समान हैं जो अपने निशाने पर निरन्तर और बहुत समय तक पहुँचती और प्रहार करती हैं. ‘जन-गण-मन’ में संग्रहीत ५६ ग़ज़लें मानों ५६ अनूठे पकवानों की महक ,रस,स्वाद से ओतप्रोत हैं. हर ग़ज़ल अपने अंदाज़ में है और आज के संसार का, उसकी गतिविधियों और सोच का सारांश प्रस्तुत करती हैं.

हास्य-व्यंग्य एक स्वस्थ तथा स्थाई उज्ज्वलता की पृष्ट -भूमि में किया गया है जिसमें न तो किसी प्रकार की दुरूहता या रिक्तता का अंशमात्र है, और न ही मज़ाक़ की शुष्कता और उदण्डता का आभास है - क्योंकि जैसे कि महात्मा मीर दाद कहते हैं - "मज़ाक़ ने मज़ाक़ उड़ाने वालों का सदा मज़ाक़ उड़ाया है." मानो कवि अपने आप और अन्य सभी को मीठी भाषा में उपदेश कर रहा हो:

"मत बातें दरबारी कर
सीधी चोट करारी कर"
इन गुणों के कारण "जन-गण-मन" की प्रत्येक ग़ज़ल को बार-बार पढ़ने को दिल करता है.एक ही लय में न होने के कारण इनमें विविधता है,अद्भुत रस है. आम आदमी केअनुभवों,उसकी आवाज़ के, उसके मन में उठते सवालों को अति सुन्दर ,सरस और सरल् भाषा में व्यक्त किया गया है .आजके ज़माने में क्या बुरा-भला हो रहा है, कैसे उसके विरुद्ध आवाज़ उठानी है,इसकी ओर संकेत करते कवि साफ़ लिखता है:

"बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
खिड़कियाँ हो हर तरफ़ ऐसी दुआ लिखते हैं हम"

इसी तरह बड़ी गहरी चोट की है कवि ने :

"अँधेरे चन्द लोगों का अगर मकसद नहीं होते
यहाँ के लोग अपनेआप में सरहद नहीं होते"

इस शेर में शक्ति है, दिशा है, तीखापन है. पढ़कर व्यक्ति अपने आपको, अन्य को झंझोड़ने लगता है.

उर्दू के शब्द प्राय: प्रयुक्त किए गए हैं परन्तु उनका अपना ही महत्व है, विशेष
स्थान है. एक उदाहरण है:

"रात में क्यों वो सियाही का बनेगा वारिस
धूप हर शख़्स के क़दमों में बिछाने वाला"


‘द्विज’ की ग़ज़लें कालरिज के सिद्धान्त "श्रेष्ठतम शब्द श्रेष्ठतम स्थान पर" की याद दिलाती हैं.

‘द्विज’ का ध्येय कुछ कहना है सरल, आसान ग़ज़ल के माध्यम से. अत: यहाँ भाषा की क्लिष्टता नहीं रखी गई है. यह तो आम लोगों की बोली में उनके भाव जज़्बे, विचार उभारने तथा व्यक्त करने का सुन्दर तथा प्रभावशाली प्रयास है. हर जगह हर तरीक़े से ठगे-दले जाते आदमी को कवि कैसे जगाने का यत्न करता है ,यह देखने योग्य है:

"
हर क़दम पर ठगा गया फिर भी
तू ख़बरदार ही नहीं होता.

बेच डालेंगे वो तेरी दुनिया
तुझसे इनकार ही ही नहीं होता

जो ‘शरण’ में गुनाह करता है
वो गुनहगार ही नहीं होता

जो ख़बर ले सके सितमगर की
अब वो अख़बार ही नहीं होता"


निश्चय ही द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लें औरों की रचनाओं से बिलकुल अलग हैं, अपनेआप में अपनी पहचान हैं . सुगम, स्पष्ट और सादा भाषा में लिखी गईं ये रम्य रचनात्मक कृतियाँ आज के इतिहास का, हालात का विशुद्ध जायज़ा भी हैं और समीक्षात्मक मूल्यांकन भी . बहुत-सी पंक्तियाँ स्वत: ही स्मरण हो जाती हैं. यहाँ कोई रोमांस की नोंक-झोंक नहीं. मनोरंजन नहीं. खोखली हँसी बिखेरने की मंशा नहीं. केवल आज के मानव, जन गण मन का दर्द व्यथा बयान करने, बताने की सतत, सफल कोशिश है, इस दौर को स्पषटतया दिखाने का का श्लाघनीय प्रयत्न है. क्योंकि:

"अनगिनत मायूसियों ख़ामोशियों के दौर में
देखना ‘द्विज’ छेड़ कर कोई ग़ज़ल उल्लास की"

‘द्विज’ की ग़ज़लें वस्तुत: कई बार उर्दू की प्रसिद्ध कविता "बुलबुल की फ़रियाद" की याद दिलाती हैं, जहाँ बुलबुल पिंजरे में बंद अपने स्वतंत्रता के दिनों को याद कर फ़रियाद करते हुए कहती है:

"गाना इसे समझकर ख़ुश हों न सुनने वाले
टूटे हुए दिलों की फ़रियाद यह सदा है"

यहाँ ‘द्विज’ भी इसी लय में कहता है, अपनी कविता के बारे में:

छोड़िए भी... फिर कभी सुनना
ये बहुत लम्बी कथाएँ हैं

ये मनोरंजन नहीं करतीं
क्योंकि ये ग़ज़ले व्यथाएँ हैं"

परन्तु इन ग़ज़लों को बार-बार सुनने की, पढ़ने की, इच्छा बनी रहेगी- यह मेरा दृढ़ विश्वास है. आशा है ‘द्विज’ भविष्य में भी और भी ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत करेगा और हमारा समाज तथा साहित्य संसार उसकी ग़ज़लों का हार्दिक स्वागत करेगा और इसे सुधारात्मक दृष्टि से भी लेगा.


‘हिमसुमन' (मई-2007) से साभार

Wednesday, May 26, 2010

द्विजेन्द्र द्विज के ‘जन-गण-मन’ पर प्रसिद्ध समालोचक कैलाश कौशल की समीक्षा

जन के मन की बेहतरी में ग़ज़ल

हिन्दी ग़ज़ल में द्विजेन्द्र ‘द्विज’ का अपना एक ख़ास मुक़ाम है। उनके ग़ज़ल संग्रह `जन-गण –मन’ में 56 ग़ज़लें संकलित हैं। जन के मन से जुड़ी इन ग़ज़लों में ‘द्विज’ ने जीवन , समाज और संस्कृति और समय के यथार्थ से बिंधे अनेक पहलू उद्घाटित किए हैं।

विगत तेइस वर्षों से हमीरपुर,पालमपुर,धर्मशाला में निवास करते हुए द्विज की ग़ज़लों में देशज संवेदना का गहरा असर है। इस संग्रह का आग़ाज़ करने वाली ग़ज़ल में पहाड़ों की आंचलिक ऊष्मा कुछ इस प्रकार व्यक्त हुई है:

ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़
लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेहरबाँ पहाड़

पत्थर-सलेट में लुटा के अस्थियाँ तमाम
मानो दधीचि-से खड़े हों जिस्मो-जाँ पहाड़ (पृ.11)

इस संग्रह में व्यक्त उनका ‘पहाड़’ हिमाचल तक ही सीमित नहीं है, मज़हब,रंग,और सियासत की रुकावटों के विरुद्ध भी अपनी आवाज़ बुलंद करता है:

ज़बान ,ज़ात या मज़हब जहाँ न टकराएँ
हमें हुज़ूर वो हिन्दोस्तान दीजिएगा(पृ.18)

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की इन ग़ज़लों में बहुत नपे तुले शब्दों में अपने समय की बृहत्तर चिंताओं को लोकतांत्रिक सोच से साझा करते हुए आवाज़ दी गई है, आज के हालात और व्यवस्था से सर्वाधिक पीड़ित और प्रताड़ित जन का मन यहाँ सघन प्रभाव के साथ व्यक्त हुआ है:

ढाँपे हैं हमने पैर तो नंगे हुए है‍ सर
या पैर नंगे हो गए सर ढाँपते हुए

है ज़ि‍दगी कमीज़ का टूटा हुआ बटन
बिंधती हैं उंगलियाँ भी जिसे टाँकते हुए

ठेट हिन्दोस्तानी की ज़िन्दगी के ठाठ को बयाँ करने वाली ये ग़ज़लें आज़ाद भारत के पिछले छ: दशकों की तस्वीर सामने प्रस्तुत कर देती हैं और बताती है‍ कि स्वार्थों की राजनीति के चलते आप आदमी निरंतर त्रस्त और पस्त होता गया है। देश-काल के व्यापक संदर्भों को इन छोटी-छोटी ग़ज़लों में बड़े हुनर के साथ पिरोया गया है:

ज़ख़्म तू अपने दिखाएगा भला किसको यहाँ
यह सदी पत्थर-सी है संवेदनाओं के ख़िलाफ़

सामने हालात की लाएँ जो काली सूरतें
हैं कई अख़बार भी उन सूचनाओं के ख़िलाफ़ (पृ. 44)
******
फ़स्ल बेशक आप सारी अपने घर ले जाइए
चंद दाने मेरे हिस्से के मुझे दे जाइए (पृ.41)
******

इन ग़ज़लों मे‍ बिना किसी आवेश या आयोजन भंगिमा के उन तमाम शोषित-उपेक्षित लोगों की की जीवन-दशा और अनुभव संसार को अपनेपन के साथ समेटा गया है और यह भी कि यह हमे‍ अपने शहर से रूबरू होने का अहसास दिलाता है:

जो सूरज हर जगह सुंदर-सुनहरी धूप देता है
वो सूरज क्यों हमारे शहर में अक्सर नहीं आता (पृ.40)

अपने संयत स्वर और सहज मुहावरे वाली सादगी से अनुप्राणित ये ग़ज़लें आजके दौर की मौजूदा व्यवस्था पर व्यंग्य करती हैं:

हुई हैं मुद्दतें आंगन में वो नहीं उतरी
यों धूप रोज़ ठहरती है सायबानों में

जगह कोई जहाँ सर हम छुपा सकें अपना
अभी भी ढूँढते फिरते हैं संविधानों में (पृ.56)

ग़ज़लकार की चिंता यही है कि :

है आज भी वहीं का वहीं आम आदमी
किस बात पर मुखर है ये संसद न पूछिए

ये ग़ज़लें प्रतिरोध के स्वभव को शक्ति -संपन्न करती हैं असुर विकलांग विकास की कलई खोलती हैं।
ग़ज़लकार की चाह भी यही है:

हो परिवर्तन
बदलें आसन

क्योंकि:

मन ख़ाली हैं
लब जन-गण-(पृ.70-71)

प्रसिद्ध कथाकार और ग़ज़लकार ज्ञानप्रकाश विवेक इस संग्रह के विषय में‍ लिखते हैं कि "ये ग़ज़लें हमारे समय की नुमाया आवाज़ हैं। संग्रह की ग़ज़लें हार्दिकता के साथ मानवीय पक्ष प्रस्तुत करते हुए, मनुष्य और उसकी गरिमा की पैरवी करती हैं...जिन्हें ‘द्विज’ जैसे दयानतदार शायर ने अपनी संपूर्ण चेतना के साथ रचा है। "

द्विज की ग़ज़लें क्लेवर में छोटी हैं पर अपने भाव संवेदन,अर्थ-परिधि और व्यंजना में गहरा असर छोड़ती हैं। सीधे मर्म तक पहुँचने वाली ये ग़ज़लें धुंध में लिपटे समय की सच्चाइयों से साक्षात्कार कराती हैं। सामान्य जन के भीतर के भाव लोक और उसके साथ होने वाली नाइंसाफ़ियों सौर बुरे बरतावों तथा समय की विद्रूपताओं को व्यंजित करती हुई ये ग़ज़लें बेबाक और पुरासर अंदाज़ में अपनी बात कहती हैं।
भाषाई स्तर पर द्विजेन्द्र ‘द्विज’ को ‘दुष्यन्त-कुल’ का ग़ज़लकार कहा जाता है। जो हिन्दी और उर्दू के बीच संतुलन कायम करते हुए सादगी और सहजता को अपनी बानगी बना लेते हैं। उनके संवेदनात्मक उद्देश्य में निहित ईमानदारी और बयान की साफ़गोई भीतर तक वह चोट करती है जिसे पा कर पाठक को सुकून मिलता है। संग्रह की भूमिका में ख्यातनाम ग़ज़लगो ज़हीर कुरैशी उनकी ग़ज़लों को हिन्दोस्तानी ठाठ की ग़ज़लें बताते हुए कहते है: ‘द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लों में एक विशेष किस्म की आंतरिकता,समझ , सलाहियत सूक्षम्ता और सघनता को महसूस किया जा सकता है।... कुल मिलाकर उनकी ग़ज़लें प्रगतिशील और जनवादी चेतना से लैस जागरूक ग़ज़लें हैं जो कोम्पलों की शैली में पल्लवित होती हैं। (पृ.9)
वस्तुत: द्विजेन्द्र द्विज उन ग़ज़लकारों में से हैं जिनके अन्दर बाहर की घटनाओं के कारण
निरंतर कुछ घटता रहता है और जिसे वे अपने साथ अपने शे’रों के माध्यम से तुरंत बाँटना चाहते हैं:

जुड़ेंगी सीधे कहीं ज़िंदगी से ये जाकर
भले ही ख़ुश्क हैं ग़ज़लें ये गुनगुनाने में

ग़ज़ल में शे’र ही कहना है ‘द्विज’, हुनरमंदी
नया तो कुछ भी नहीं क़ाफ़िए उठाने में (पृ.67)

ये ग़ज़लें अपनी संप्रेषणीयता में सहज किन्तु असाधारण, असरदार और अपने ‘समय की पागल हवाओं के ख़िलाफ़’ नई इबारत लिखती हैं:

आख़िरी पत्ते ने बेशक चूम ली आख़िर ज़मीन
पर लड़ा वो शान से पागल हवाओं के ख़िलाफ़

साभार : डा. कौशल नाथ उपाध्याय के संपादन में जोधपुर से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सेतु’ (अक्टूबर-नवंबर-2008)

Wednesday, January 13, 2010

द्विजेंद्र ‘द्विज’ पर मशहूर शायर और अतिथि-सम्पादक ‘फ़िक्रो-फ़न’ सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ शिमलवी

एक ताबनाक चिंगारी

नौजवान नस्ल के आतिशख़ाना से जो चिंगारियाँ निकल रही हैं, उनमें से एक निहायत ताबनाक (ज्योतिर्मयी) चिंगारी का नाम है द्विजेंद्र ‘द्विज’. अपनी इनफ़रादी (मौलिक) सोच और लबो-लहज़ा (कहन, कहने का ढँग) के सबब वो दूसरों से अलग नज़र आते हैं. उनके क़लाम में फ़िक्रो-अहसास की ताज़गी, अस्रे-हाज़िर (वर्तमान समय) के हालात की अक्कासी, इन्सानी दोस्ती का जज़्बा ख़ास तौर पर नुमायाँ है. वो अपने मुशाहदात (पर्यवेक्षण) तजरिबात(प्रयोग) और अहसासात(अनुभवों) को दिल की आँच में तपाकर निहायत पुरदर्द , पुरसोज़ और पुरअसर अंदाज़ में लफ़्ज़ों में पिरोते हैं. उनका फ़न(कला) मआनवीयत(अर्थपूर्णता), गहराई , सेहतमंदी और साफ़गोई (स्पष्टवादिता) का हामिल(पक्षधर) है. ख़ौफ़ो-हिरास (भय और त्रास) की धूल में लिपटा हुआ इंसान उनके अश’आर में बसा हुआ है.

‘द्विज’ ने ख़ुद को हमेशा असरी ज़िन्दगी (प्रभावी जीवन)के नज़दीक रखा है. वो अपने बेअमाँ(असुरक्षित) और बेदरमाँ(ला-इलाज) अह्द के मआशी(जीविका संबंधी) और मुआशरती इंतिशार (सह-अस्तित्व के बिखराव) और उसकी नफ़्सियाती(मनोवैज्ञानिक) और माद्दी (भौतिक)परीशानियों से आगाह हैं . वो अहद कि जिसमें पुरानी क़द्रों (मूल्यों)को ग्रहण लग चुका है और ज़ाती मफ़ादात(व्यक्तिगत लाभ) के लिए अख़लाक(चरित्र) और मरव्वत(संवेदना) को बाला-ए-ताक़ दिया गया है, उसकी खुलकर मज़म्मत(निंदा) करते हैं. उन्हें एक साफ़-सुथरे मुआशरे(समाज)की तलाश है. वो अम्नो-मुसावात(शांति और समानता) , भाईचारगी, फ़िरक़ावाराना-हमआहंगी (सांप्रदायिक सद्भाव) और जम्हूरी क़द्रों (लोकतांत्रिक मूल्यों) की बहाली के ख़्वाब देखते हैं और जब इन ख़्वाबों पर ज़र्ब पड़ती है तो उनकी शे’री सोच पर तल्ख़ी के अक़्स उभर आते हैं,लेकिन उनकी तल्ख़ी कड़वाहट में नहीं बदलती. वो ज़ख़्म-ख़ुर्दा(ज़ख़्म खाए हुए) हैं, मगर दिल-शिकस्ता नहीं. मायूसियों के सैलाब में भी अज़्मो-इस्तिकलाल(स्वाबलंबन का प्रण) रखते हैं. मताए-ख़ुदी(आत्म-सम्मान की दौलत)को हमेशा बरक़रार रखने में उनका यक़ीन है, जो उनकी ख़ुद्दार तबीयत का ग़म्माज़ है(परिचायक) . बिँधती हुई उँगलियों के बावजूद वो ज़िंदगी की क़मीज़ के टूटे हुए बटनों को टाँकने में मसरूफ़ हैं.

‘द्विज’ की शायरी ग़ैर-ज़रूरी सन्नाई(अनावश्यक कला-कर्म) से आरी (स्वतंत्र)है. ज़बान और लहज़ा नामानूस(अपरिचित) और मुबहम(अस्पष्ट) नहीं. उस्लूब(शैली) सादा, सलीस और आमफ़हम है.

मेरे हक़ीर ख़याल में एक अच्छे शे’र की अहम पहचान यही है कि वो सच्चा हो. ‘द्विज’ बज़ाते-ख़ुद सरापा महब्बत हैं और एक सच्चे इन्सान. उनका सुख-दुख भी सच्चा है. यही वजह है कि उनके शे’र सच्चे लगते हैं. वो दिन दूर नहीं कि जब अपनी इनफ़रादी(मौलिक) आन-बान और सच्चाई के बाइस(कारण) उनकी आवाज़ ग़ज़ल की भीड़ में दूर से पहचानी जाएगी.

सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ शिमलवी
15 जनवरी,2003. शिमला

Saturday, January 9, 2010

Dr.P.K. Sharma on Dwijendra Dwij's "JAN-GAN-MAN" in Poet-Crit (International)July-Aug 2004

"Jan-gan-man" as the title indicates is essentially poet's encounter with the world as he finds it. It would not be off the point to call them 'protest poems' if we can give this generalised description.


Each `ghazal' is born out of experience (real or virtual) and therefore, has an immediacy of effect.it comes as the poet's authentic voice. Obviously this kind of poetry tends to settle into satire since it is directed at socio-politico-econimic disorder in the society. Poet's consciousness is continuously battling with the chaos,cruelty and hypocrisy that is so pervasive all around. The good thing about these ghazals is that satire is controlled and well directed.it is not vitriolic in character.The poet uses his anger creatively against the rottenness in the system.
I only wish the poet should not stay with the protest mode. He has to go beyond where his quarrels start with himself and he looks at the world through the crystal of lhis unified vision.W.B. yeats has aptly remarked that out of quarrel with the world comes rhetoric and out of quarrel with oneself comes poetry. I see these poems not only his quarrel with the world but also with himself. Best things are born out of thi battling of the soul.
I do not understand much about the discipline of ghazal as genre. But these do have telling effect on the reader, particularly if these are read aloud. As the review writer in the book has pointed out, poets language is Hindustani which, I think,has come to stay in literature though some purists might feel a little uneasy about it.
Dwij's poetry has a ring of total sincerity about it and it cannot be accused of any false note.I wish some of the ghazals could be set to song and music to get the best out of them.


Courtesy : Poet-Crit (International)July-Aug 2004