<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392</id><updated>2012-02-20T18:47:15.872-08:00</updated><category term='दूसरी ग़ज़ल'/><category term='तीसरी ग़ज़ल'/><category term='sameeksha श्री चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद'/><category term='सच्चे गीत उल्लास के'/><category term='जन-गण-मन की पहली ग़ज़ल'/><category term='जन के मन की बेहतरी में ग़ज़ल'/><title type='text'>जन-गण-मन</title><subtitle type='html'>द्विजेन्द्र द्विज का ग़जल संग्रह</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>13</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-6547936354210075915</id><published>2012-02-19T00:32:00.000-08:00</published><updated>2012-02-19T00:52:02.873-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='sameeksha श्री चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद'/><title type='text'>पहाड़ी कवि की पुकार- ‘जन-गण-मन’</title><content type='html'>द्विजेंद्र द्विज के&lt;a href="http://http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%97%E0%A4%A3-%E0%A4%AE%E0%A4%A8_/_%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%27%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%27"&gt; “जन- गण - मन”&lt;/a&gt; पर प्रख्यात समीक्षक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;श्री चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहाड़ी कवि की पुकार- ‘जन-गण-मन’&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“ये मनोरंजन नहीं करती&lt;br /&gt;क्योंकि ये ग़ज़लें व्यथाएँ हैं"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी ग़ज़ल की यात्रा अमीर ख़ुसरो से शुरू होते हुए भारतेन्दु, बद्री नारायण चौधरी, प्रताप नारायण मिश्र, नाथू राम शर्मा ‘शंकर’, जयशंकर प्रसाद,निराला, शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन,,जानकी वल्लभ शास्त्री, बलबीर सिंह ‘रंग’ आदि अनगिनत कवियों की कलम से रवाँ होती गई और आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल की दूसरी पारी दुष्यन्त कुमार की हुई। आज की हिन्दी ग़ज़ल उर्दू के हुस्नो-इश्क़ और जामो-मीना को छोड़कर काफ़ी आगे निकल गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“ जो हुस्नो-इश्क़ की वादी से जा सके आगे&lt;br /&gt;ख़याले-शायरी को वो उड़ान दीजिएगा । "&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आजकी ग़ज़ल मानव की समस्याओं और संवेदनाओं को बयाँ करती है। कभी-कभी इन्हीं पहलुओं पर अपने तेवर दिखाते हुए शायरी ‘तेवरी’ का रूप भी धर लेती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;‘मत बातें दरबारी कर&lt;br /&gt;सीधी चोट करारी कर’&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्विजेंद्र द्विज आजके ऐसे ग़ज़लगो हैं जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों तक पहुँचते रहे हैं। अब उनक पहला ग़ज़ल संग्रह “जन-गण-मन” पाठकों के बीच आया है जिसमें छप्पन ग़ज़लें संकलित हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“मन ख़ाली हैं&lt;br /&gt;लब जन-गण-मन’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``निर्वासित है&lt;br /&gt;क्यों जन-गण-मन"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘द्विज’ वो पहाड़ी कवि हैं जिन्होंने अपने जीवन की चौथाई सदी मारंडा (पालमपुर) रोहड़ू ,हमीरपुर, कांगड़ा और धर्मशाला जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में गुज़ार दी । यद्यपि वे अ~म्ग्रेज़ी के प्राध्यापक हैं परन्तु अपने जज़्बात को बयाँ करने के लिए उन्होंने उन्होंने ग़ज़ल को अपना माध्यम बनाया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़&lt;br /&gt;लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेहरबाँ पहाड़ ”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब इन सुन्दर मेहरबान पहाड़ों  को मानव प्रदूषित करता है,तब भी वे अपने सत्कार की परंपरा को नहीं भूलते ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“कचरा व प्लास्टिक मिले उपहार में इन्हें&lt;br /&gt;सैलानियो के ‘द्विज’ हुए हैं मेज़बाँ पहाड़”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजका कोई भी साहित्यकार जीवन के गिरते मूल्यों पर चिंता व्यक्त करने से नहीं चूकता। ‘द्विज’ ने भी “जन-गण-मन” में समाज के पतन पर चिंता व्यक्त की है। यद्यपि इस मुद्दे पर हर कोई बात करता है परंतु इसे अमली जामा कौन पहनाएगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“तहज़ीब यह नई है इसको सलाम कहिये&lt;br /&gt;रावण जो सामने हों उनको भी राम कहिये”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“बहस के मुद्दओं में मौलवी थे पंडित थे&lt;br /&gt;वहाँ ‘द्विज’ आदमी का ही निशाँ नहीं देखा”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्हें सरपरस्त समझकर देश की बागडोर हम थमाते हैं वे भी झूठे आश्वासन दे कर अपनी राजनीति चलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“आश्वासन, भूख,बेकारी, घुटन, धोखाधड़ी&lt;br /&gt;हाँ, यही सब तो दिया है आपके विश्वास ने”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीति का एक और शस्त्र बन गया है मज़हब,जिसके कारन न सिर्फ़ देश का बँटवारा हुआ, बल्कि मासूम लोगों का ख़ून भी बस्तियों में बह रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“फिर से ख़ंजर थाम लेंगी हँसती-गाती बस्तियाँ&lt;br /&gt;जब नए दंगों का फिर वो मुद्दआ दे जाएगा”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि कुछ समाज सेवी इन दंगों का हल निकालना भी चाहें तो राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले इसे ख़त्म नहीं होने देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“जमीं हैं हर गली में ख़ून की देखो कई पर्तें&lt;br /&gt;मगर दंगे कभी इनको तुम्हें धोने नहीं देंगे”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ नीयत न साफ़ और थी न जब ज़बान साफ़&lt;br /&gt;होता भी कैसे आपका कोई बयान साफ़”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;देश के लोग ग़रीबी की चक्की में पिस रहे हैं रोटी, कपड़ा और मकान पर नेता रात-दिन भाषण देते हैं परन्त आज भी कवि उनसे यही माँग करता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जो छत हमारे लिए भी कोई दिला पाए&lt;br /&gt;हमें भी ऐसा कोई संविधान दीजिएगा”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘द्विज’ ने साहित्य में फैल रहे “प्रदूषण" पर भी चिंता व्यक्त की है। जिस प्रकार शिक्षा क्षेत्र में राजनीति की जा रही है या पुरस्कारों की होड़ में उठा-पटक चल रही है, उसपर भी ‘द्विज’ ने कलम चलाई है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“पृष्ठ तो इतिहास के जन-जन को दिखलाए गए&lt;br /&gt;ख़ास जो संदर्भ थे केवल वो झुठलाए गए"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुनर तो था ही नहीं उनमें जी हुज़ूरी का&lt;br /&gt;इसीलिए तो ख़िताबों से दूर  रक्खे गए”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;द्विजेंद्र ‘द्विज’ उन ग़ज़लकारों में से एक हैं जिन्होंने दुष्यन्त की लीक पर चलते हुए हिन्दी और उर्दू को एक सूत्र में बाँधा है। ज़हीर क़ुरेशी ने इस पुस्तक की भूमिका में सही कहा है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“भाषाई स्तर पर द्विजेंद्र ‘द्विज’ दुष्यन्त कुल के ग़ज़लकार हैं, हिन्दी और उर्दू के बीच संतुलन कायम करने वाले । द्विजेंद्र की ग़ज़लों का भाषाई लहजा सादा और साफ़ है....जहाँ तक शेरों में पसरी गई विषय वस्तु का सवाल है तो ‘द्विज’ का कैन्वास काफ़ी विस्तृत है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन-गन-मन के अशआर पढ़ते हुए पाठक का एक-एक शे‘र पर दाद देने को मन चाहेगा । आशा है , इस ग़ज़लकार के प्रथम संकलन को वही सम्मान मिलेगा जो किसी भी मंझे हुए शायर के संग्रह को मिलता है।&lt;br /&gt;---- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चन्द्र मौलेश्वर प्रसाद&lt;br /&gt;1-8-28, यशवंत भवन, अलवाल,&lt;br /&gt;सिकन्दराबाद -500010(आं.प्र.)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;साभार:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहकारी युग (साप्ताहिक) दिनांक 25 अक्तूबर,2004 (संपादक नीलम गुप्ता, B-ब्लॉक,26/27,अब्बास मार्केट, रामपुर-244901)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-6547936354210075915?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/6547936354210075915/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2012/02/blog-post_19.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/6547936354210075915'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/6547936354210075915'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2012/02/blog-post_19.html' title='पहाड़ी कवि की पुकार- ‘जन-गण-मन’'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-2202560717179891830</id><published>2012-02-17T07:34:00.000-08:00</published><updated>2012-02-17T07:36:21.158-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तीसरी ग़ज़ल'/><title type='text'>जन-गण-मन  की तीसरी ग़ज़ल</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जन-गण-मन  की तीसरी ग़ज़ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम&lt;br /&gt;खिड़कियाँ हों हर तरफ़ ऐसी दुआ लिखते हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी को आदमी से दूर जिसने कर दिया&lt;br /&gt;ऐसी साज़िश के लिए हर बद्दुआ  लिखते हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो बिछाई जा रही हैं ज़िन्दगी की राह में&lt;br /&gt;उन सुरंगों से निकलता रास्ता लिखते हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोशनी का नाम देकर आपने बाँटे हैं जो&lt;br /&gt;उन अँधेरों को कुचलता हौसला लिखते हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ला सके  सबको बराबर  मंज़िलों के रास्ते&lt;br /&gt;हर क़दम पर एक ऐसा क़ाफ़िला लिखते हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सादर &lt;br /&gt;द्विजेन्द्र द्विज&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-2202560717179891830?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/2202560717179891830/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2012/02/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/2202560717179891830'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/2202560717179891830'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='जन-गण-मन  की तीसरी ग़ज़ल'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-8010317455064591294</id><published>2011-10-14T19:43:00.000-07:00</published><updated>2011-10-15T02:24:15.098-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दूसरी ग़ज़ल'/><title type='text'>जन-गण -मन की दूसरी ग़ज़ल</title><content type='html'>आदरणीय व प्रिय मित्रो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिनों से नई पोस्ट नहीं लगा पाया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संकलन  &lt;strong&gt;जन-गण-मन&lt;/strong&gt; की दूसरी ग़ज़ल प्रस्तुत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अँधेरे चन्द लोगों का अगर  मक़सद नहीं होते&lt;br /&gt;यहाँ के लोग अपने-आप में  सरहद नहीं होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न भूलो, तुमने ये ऊँचाईयाँ भी हमसे छीनी हैं &lt;br /&gt;हमारा क़द नहीं लेते तो   आदमक़द नहीं होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़रेबों की  कहानी  है  तुम्हारे  मापदण्डों  में&lt;br /&gt;वगरना हर जगह बौने कभी  अंगद  नहीं होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी भला कब तक&lt;br /&gt;वहाँ पर भी बसेरे हैं जहाँ   गुंबद नहीं होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा&lt;br /&gt;सफ़र में हर जगह सुन्दर-घने बरगद नहीं होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सादर&lt;br /&gt;द्विजेन्द्र द्विज&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-8010317455064591294?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/8010317455064591294/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/8010317455064591294'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/8010317455064591294'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;जन-गण -मन की दूसरी ग़ज़ल&lt;/strong&gt;'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-4038965137545642732</id><published>2010-06-27T09:51:00.000-07:00</published><updated>2010-06-27T09:56:42.217-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जन-गण-मन की पहली ग़ज़ल'/><title type='text'>ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़&lt;br /&gt;लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेहरबाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैं तो बुलन्द हौसलों के तर्जुमाँ पहाड़&lt;br /&gt;पर बेबसी के भी बने हैं कारवाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थी मौसमों की मार तो बेशक बडी शदीद&lt;br /&gt;अब तक बने रहे हैं मगर सख़्त-जाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीने सुलग के हो रहे होंगे धुआँ-धुआँ&lt;br /&gt;ज्वालामुखी तभी तो हुए बेज़बाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्थर-सलेट में लुटा कर अस्थियाँ तमाम&lt;br /&gt;मानो दधीचि-से खड़े हों जिस्मो-जाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदियों,सरोवरों का भी होता कहाँ वजूद&lt;br /&gt;देते न बादलों को जो तर्ज़े-बयाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो तो रहेगा खोद कर उनकी जड़ें तमाम&lt;br /&gt;बेशक रहे हैं आदमी के सायबाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीनों से इनके बिजलियाँ,सड़कें गुज़र गईं&lt;br /&gt;वन, जीव, जन्तु, बर्फ़, हवा, अब कहाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कचरा,कबाड़,प्लास्टिक उपहार में मिले&lt;br /&gt;सैलानियों के ‘द्विज’, हुए हैं मेज़बाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-4038965137545642732?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/4038965137545642732/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/06/blog-post_27.html#comment-form' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/4038965137545642732'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/4038965137545642732'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/06/blog-post_27.html' title='ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-4380016030747880402</id><published>2010-06-22T03:46:00.000-07:00</published><updated>2010-06-22T04:53:29.608-07:00</updated><title type='text'>एक सजग रचनाकार की संघर्ष चेतना का प्रतिरोधात्मक प्रतिज्ञापत्र</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;द्विज के&lt;a href="http://http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%97%E0%A4%A3-%E0%A4%AE%E0%A4%A8_/_%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_'%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C'"&gt; ‘जन-गण-मन’&lt;/a&gt; पर प्रख्यात समालोचक  नचिकेता की समीक्षा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; ‘जन-गण-मन‘&lt;/span&gt; द्विजेन्द्र द्विज की बेहतरीन छ्प्पन गज़लों का पहला संग्रह है। द्विजेन्द्र ‘द्विज’ उन गज़लकारों में से महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं जिन्हें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के जरिए इस पहले गज़ल संग्रह के प्रकाशन के पूर्व ही स्थापित ग़ज़लकार का दर्ज़ा मिल चुका है। दरअसल द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लों की बनावट और बुनावट अपने समकालीनों से बिल्कुल अलहदा है। द्विज के पास समकालीन यथार्थ की बहुस्तरीय संश्लिष्टता सार्थक अभिव्यक्ति देने में सक्षम भाषा है,जिसमें बिम्ब,प्रतीक और संकेतों के समन्वय और सामंजस्य की सघनता है। इसके बावजूद कहीं भी अमूर्त्तनता या अर्थहीनता का आभास नहीं मिलता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्विजेन्द्र ‘द्विज’ के पास अपने समय और समाज के अंतर्विरोधों की भीतरी परतों को भी एक्स-रे की तरह परखने वाली सूक्षम अंतर्दृष्टि है। अपने समय की लहुलुहान हकीकत को उसमें संपूर्ण जटिलता में समग्रता के साथ व्यक्त करने की चुनौती स्वीकार करने में द्विजेन्द्र द्विज की गज़लों को कोई हिचक महसूस नहीं होती। परिणामत: उनकी ग़ज़लों से व्यापक मध्यवर्गीय जन-जीवन की त्रासदियों सामाजिक अंतर्विरोधों,राजनीतिक विसंगतियों आर्थिक असमानताओं मूल्य विघटन और सांस्कृतिक अवमूल्यन के कारणों को परखने में कोई चूक नहीं होती:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"आँखों पर बाँधी गईं ऐसी अँधेरी पट्टियाँ&lt;br /&gt;घाटियों के सब सुनहरे दृश्य धुँधलाए गए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घाट था सब के लिए पर फिर भी जाने क्यों वहाँ&lt;br /&gt;कुछ प्रतिष्ठित लोग ही चुन -चुन के नहलाए गए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कहीं ख़तरा नहीं था आसमाँ भी साफ़ था&lt;br /&gt;फिर परिंदे क्यों वहाँ सहमे हुए पाए गए"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अथवा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"सर से पाँवों तक अब भी हम  भीगे हैं&lt;br /&gt;कैसे छप्पर, कैसे उनके छाते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूखे में बरसात की बातें करते हैं&lt;br /&gt;फिर भी पानी से वो क्यों डर जाते हैं"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हम रोज़ देखते हैं कि हमारे सियासी रहनुमा  हमें मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखला कर बहलाया करते हैं और हमें उनके शोषण के नापाक इरादों का पता तब चलता है जब हमारी साँसों में ताज़ा हवा की जगह कड़वा धुआँ भर जाता है। शोषक शासक वर्ग की इन रेशमी मगर ख़तरनाक हरकतों को द्विज की ग़ज़लें बेलौस ढंग से बेनक़ाब करती हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"चंद ख्वाबों को हक़ीक़त में बदलने के लिए&lt;br /&gt;कितने ख़्वाबों का वहाँ ग़बन होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब धुआँ साँस की चौखट पे ठहर जाता है&lt;br /&gt;तब हवाओं को बुलाने का जतन होता है&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;या&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तुम्हारे आँसुओं को सोख लेगी आग दहशत की&lt;br /&gt;तुम्हें पत्थर बना देंगे तुम्हें रोने नहीं देंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घड़ी भर के लिए जो नींद मानों मोल भी ले ली&lt;br /&gt;भयानक ख़वाब तुमको चैन से सोने नहीं देंगे ."&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आज की उपभोक्तावादी संस्कृति का सबसे ज़्यादा आक्रमण संवेदना पर ही हुआ है।संवेदन शून्य आत्मपरकता और स्वार्थपरकता की ऐसी भयानक आँधी चली है कि पूरी सदी ही पथरा गई-सी दृष्टिगोचर होती है। संवेदनहीन, स्पंदनविहीन इस अमानवीय यातनागृह से छुटकारा पाने की छटपटाहट द्विजेन्द्र द्विज की इन ग़ज़लों में शिद्दत के साथ और मार्मिक ढंग से मुखरित हुई है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"ज़ख़्म तू अपने दिखाएगा भला किसको यहाँ &lt;br /&gt;यह सदी पत्थर-सी है, संवेदनाओं के ख़िलाफ़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक भी होता नहीं मर भी नहीं पाता मरीज़&lt;br /&gt;कीजिए कुछ तो दवा ऐसी दवाओं के ख़िलाफ़"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि द्विजेन्द्र द्विज मौजूदा दौर के सामाजिक यथार्थ और उसके अंतर्विरोधों की भीतरी परतों को सिर्फ़ उघारते भर नहीं अपितु नई समाज रचना के लिए संघर्षशील आवाम को एकजुट संघर्ष के वास्ते लामबद्ध करते हैं।इस लिए इनकी ग़ज़लों में ऐसा बहुत कुछ नवीन और मौलिक है जो केवल नएपन के इज़हार के लिए नहीं बल्कि अपने सामाजिक अनुभव को राजनीतिक विमर्श की शक्ल देने के सार्थक प्रयास का नतीजा मालूम होता है। अतएव द्विजेन्द्र द्विज की सार्थक ग़ज़लें अपने पाठकों की संवेदना के कोमल तंतुओं को केवल सहलाती, गुदगुदाती और रोमांचित ही नहीं करतीं प्रत्युत बेचैन भी करती हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;" जिया झुका के जो सर ज़िल्लतों में, ज़ुल्मों में&lt;br /&gt;न हो वो क़त्ल कोई बेज़ुबाँ नहीं देखा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिलाएगा तुझे पानी जो तेरे घर आकर&lt;br /&gt;अभी किसी ने भी ऐसा कुआँ नहीं देखा"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अथवा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"धूप ख़यालों की खिलते ही वो भी आख़िर पिघलेंगे&lt;br /&gt;बैठ गए हैं जमकर जो हिमपात हमारी यादों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सह जाने का चुप रहने का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं&lt;br /&gt;पलता नहीं है कोई भी प्रतिघात हमारी यादों में"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;द्विजेन्द्र द्विज की ग़ज़लें, दरहक़ीक़त,समकालीन सामाजिक राजनीतिक वातावरण पर एक सजग रचनाकार की संघर्ष चेतना का प्रतिरोधात्मक प्रतिज्ञापत्र हैं \ कहीं यह आईना दिखाती हैं तो कहीं मुँह चिढ़ाती प्रतीत होती हैं कहीं पीड़ा है तो कहीं आक्रोश भी है। ये ग़ज़लें कही चेतावनी देती हैं तो कहीं चुनौती। कहीं अपील करती महसूस होती हैं तो कहीं संघर्ष का आह्वान करती।कहीं फटकार है तो कहीं दिलासा। कहीं सलाह है तो कहीं संवाद। कहीं रचनाकार का आत्मकथ्य नज़र आती हैं तो कहीं वक्तव्य भी। इन्हीं द्वन्द्वात्मक अंतर्विरोधों/मनस्थितियों की खुरदरी ज़मीन पर खड़ी हो कर द्विजेन्द्र द्विज की ग़ज़लें अपने समय और समाज को और अधिक मनवीय बनाने के निमित्त संघर्षरत हैं ख़ूबसूरत अंदाज़े- बयाँ में नुमाया द्विजेन्द्र द्विज  की ग़ज़लों की वैचारिक अंतर्वस्तु जितनी पुख़्ता और मज़बूत है, प्रभावी अंतर्वस्तु फाँक भी उतनी ही अधिक चौड़ी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;साभार: कृष्णानंद कृष्ण के संपादन में  पटना से प्रकाशित पत्रिका पुन: (अंक-१५, नवम्बर-२००३)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-4380016030747880402?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/4380016030747880402/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/4380016030747880402'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/4380016030747880402'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html' title='एक सजग रचनाकार की संघर्ष चेतना का प्रतिरोधात्मक प्रतिज्ञापत्र'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-4486700763012603083</id><published>2010-06-03T10:21:00.000-07:00</published><updated>2010-06-03T10:35:45.145-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सच्चे गीत उल्लास के'/><title type='text'>सच्चे गीत उल्लास के</title><content type='html'>द्विजेन्द्र ‘द्विज’ के ग़ज़ल संकलन&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; जन-गण-मन &lt;/span&gt;पर डा० आत्मा राम (प्रख्यात समालोचक, शिक्षाविद, व्यंग्यकार,तथा पूर्व शिक्षा निदेशक हिमाचल प्रदेश)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लें सरल भाषा में तीखे और कारगर भाषा में सीधे तीर के समान हैं जो अपने निशाने पर  निरन्तर और बहुत समय तक पहुँचती और प्रहार करती हैं. ‘जन-गण-मन’ में संग्रहीत ५६ ग़ज़लें मानों ५६ अनूठे पकवानों की महक ,रस,स्वाद से ओतप्रोत हैं. हर ग़ज़ल अपने अंदाज़ में है और आज के संसार का, उसकी गतिविधियों और सोच का सारांश प्रस्तुत करती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हास्य-व्यंग्य एक स्वस्थ तथा स्थाई उज्ज्वलता की पृष्ट -भूमि में किया गया है जिसमें न तो किसी प्रकार की दुरूहता या रिक्तता का अंशमात्र है, और न ही मज़ाक़ की शुष्कता और उदण्डता का आभास है - क्योंकि जैसे कि महात्मा मीर दाद कहते हैं - "मज़ाक़ ने मज़ाक़ उड़ाने वालों का सदा मज़ाक़ उड़ाया है." मानो कवि अपने आप और अन्य सभी को मीठी भाषा में उपदेश कर रहा हो:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मत बातें दरबारी कर&lt;br /&gt;सीधी चोट करारी कर"&lt;br /&gt;इन गुणों के कारण "जन-गण-मन" की प्रत्येक ग़ज़ल को बार-बार पढ़ने को दिल करता है.एक ही लय में न होने के कारण इनमें विविधता है,अद्भुत रस है. आम आदमी केअनुभवों,उसकी आवाज़ के, उसके मन में उठते सवालों को अति सुन्दर ,सरस और सरल् भाषा में व्यक्त किया गया है .आजके ज़माने में क्या बुरा-भला हो रहा है, कैसे उसके विरुद्ध आवाज़ उठानी है,इसकी ओर संकेत करते कवि साफ़ लिखता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;"बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम&lt;br /&gt;खिड़कियाँ हो हर तरफ़ ऐसी दुआ लिखते हैं हम"&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह बड़ी गहरी चोट की है कवि ने :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;"अँधेरे चन्द लोगों का अगर मकसद नहीं होते&lt;br /&gt;यहाँ के लोग अपनेआप में सरहद नहीं होते"&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;इस शेर में शक्ति है, दिशा है, तीखापन है. पढ़कर व्यक्ति अपने आपको, अन्य को झंझोड़ने लगता है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उर्दू के शब्द प्राय: प्रयुक्त किए गए हैं परन्तु उनका अपना ही महत्व है, विशेष&lt;br /&gt; स्थान है. एक उदाहरण है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;"रात में क्यों  वो सियाही का बनेगा वारिस&lt;br /&gt;धूप हर शख़्स के क़दमों में  बिछाने वाला"&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘द्विज’ की ग़ज़लें कालरिज के सिद्धान्त "श्रेष्ठतम शब्द श्रेष्ठतम स्थान पर"  की याद दिलाती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘द्विज’ का ध्येय कुछ कहना है सरल, आसान ग़ज़ल के माध्यम से. अत: यहाँ भाषा की क्लिष्टता नहीं रखी गई है. यह तो आम लोगों की बोली में उनके भाव जज़्बे, विचार उभारने तथा व्यक्त करने का सुन्दर तथा प्रभावशाली प्रयास है. हर जगह हर तरीक़े से ठगे-दले जाते आदमी को कवि कैसे जगाने का यत्न करता है ,यह देखने योग्य है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"&lt;blockquote&gt;हर क़दम पर ठगा गया फिर भी&lt;br /&gt;तू ख़बरदार ही नहीं होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेच डालेंगे वो तेरी दुनिया&lt;br /&gt;तुझसे इनकार ही ही नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो ‘शरण’ में गुनाह करता है&lt;br /&gt;वो गुनहगार ही नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो ख़बर ले सके सितमगर की&lt;br /&gt;अब वो अख़बार ही नहीं होता"&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चय ही द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लें औरों की रचनाओं से बिलकुल अलग हैं, अपनेआप में अपनी पहचान हैं . सुगम, स्पष्ट और सादा भाषा में लिखी गईं ये रम्य रचनात्मक कृतियाँ आज के इतिहास का, हालात का विशुद्ध जायज़ा भी हैं और समीक्षात्मक मूल्यांकन भी . बहुत-सी पंक्तियाँ स्वत: ही स्मरण हो जाती हैं. यहाँ कोई रोमांस की नोंक-झोंक नहीं. मनोरंजन नहीं. खोखली हँसी बिखेरने की मंशा नहीं. केवल आज के मानव, जन गण मन का दर्द व्यथा बयान करने, बताने की सतत, सफल कोशिश है, इस दौर को स्पषटतया दिखाने का का श्लाघनीय प्रयत्न है. क्योंकि:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;"अनगिनत मायूसियों ख़ामोशियों के दौर में&lt;br /&gt;देखना ‘द्विज’ छेड़ कर कोई ग़ज़ल उल्लास की"&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;‘द्विज’ की ग़ज़लें वस्तुत: कई बार उर्दू की प्रसिद्ध कविता "बुलबुल की फ़रियाद" की याद दिलाती हैं, जहाँ बुलबुल पिंजरे में बंद अपने स्वतंत्रता के दिनों को याद कर फ़रियाद करते हुए कहती है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"गाना इसे समझकर ख़ुश हों न सुनने वाले&lt;br /&gt;टूटे हुए दिलों की फ़रियाद यह सदा है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ ‘द्विज’ भी इसी लय में कहता है, अपनी कविता के बारे में:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;छोड़िए भी... फिर कभी सुनना&lt;br /&gt;ये बहुत लम्बी कथाएँ हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये मनोरंजन नहीं करतीं&lt;br /&gt;क्योंकि ये ग़ज़ले व्यथाएँ हैं"&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;परन्तु इन ग़ज़लों को बार-बार सुनने की, पढ़ने की, इच्छा बनी रहेगी- यह मेरा दृढ़ विश्वास है. आशा है ‘द्विज’ भविष्य में भी और भी ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत करेगा और हमारा समाज तथा साहित्य संसार उसकी ग़ज़लों का हार्दिक स्वागत करेगा और इसे सुधारात्मक दृष्टि से भी लेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हिमसुमन' (मई-2007) से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-4486700763012603083?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/4486700763012603083/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/4486700763012603083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/4486700763012603083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='सच्चे गीत उल्लास के'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-5639010625015994998</id><published>2010-05-26T21:54:00.000-07:00</published><updated>2010-05-26T21:57:16.905-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जन के मन की बेहतरी में ग़ज़ल'/><title type='text'>द्विजेन्द्र द्विज के ‘जन-गण-मन’ पर प्रसिद्ध समालोचक कैलाश कौशल की समीक्षा</title><content type='html'>जन के मन की बेहतरी में ग़ज़ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी ग़ज़ल में द्विजेन्द्र ‘द्विज’ का अपना एक ख़ास मुक़ाम है। उनके ग़ज़ल संग्रह `जन-गण –मन’ में 56 ग़ज़लें संकलित हैं। जन के मन से जुड़ी इन ग़ज़लों में ‘द्विज’ ने जीवन , समाज और संस्कृति और समय के यथार्थ से बिंधे अनेक पहलू उद्घाटित किए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विगत तेइस वर्षों से हमीरपुर,पालमपुर,धर्मशाला में निवास करते हुए द्विज की ग़ज़लों में देशज संवेदना का गहरा असर है। इस संग्रह का आग़ाज़ करने वाली ग़ज़ल में पहाड़ों की आंचलिक ऊष्मा कुछ इस प्रकार व्यक्त हुई है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़&lt;br /&gt;लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेहरबाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्थर-सलेट में लुटा के अस्थियाँ तमाम&lt;br /&gt;मानो दधीचि-से खड़े हों जिस्मो-जाँ पहाड़ (पृ.11)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संग्रह में व्यक्त उनका ‘पहाड़’ हिमाचल तक ही सीमित नहीं है, मज़हब,रंग,और सियासत की रुकावटों के विरुद्ध भी अपनी आवाज़ बुलंद करता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़बान ,ज़ात या मज़हब जहाँ न टकराएँ&lt;br /&gt;हमें हुज़ूर वो हिन्दोस्तान दीजिएगा(पृ.18)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की इन ग़ज़लों में बहुत नपे तुले शब्दों में अपने समय की बृहत्तर चिंताओं को लोकतांत्रिक सोच से साझा करते हुए आवाज़ दी गई है, आज के हालात और व्यवस्था से सर्वाधिक पीड़ित और प्रताड़ित जन का मन यहाँ सघन प्रभाव के साथ व्यक्त हुआ है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढाँपे हैं हमने पैर तो नंगे हुए है‍ सर&lt;br /&gt;या पैर नंगे हो गए सर ढाँपते हुए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है ज़ि‍दगी कमीज़ का टूटा हुआ बटन&lt;br /&gt;बिंधती हैं उंगलियाँ भी जिसे टाँकते हुए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठेट हिन्दोस्तानी की ज़िन्दगी के ठाठ  को बयाँ करने वाली ये ग़ज़लें आज़ाद भारत के पिछले छ: दशकों की तस्वीर सामने प्रस्तुत कर देती हैं और बताती है‍ कि स्वार्थों की राजनीति के चलते आप आदमी निरंतर त्रस्त और पस्त होता गया है। देश-काल के व्यापक संदर्भों को इन छोटी-छोटी ग़ज़लों में बड़े हुनर के साथ पिरोया गया है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़ख़्म तू अपने दिखाएगा भला किसको यहाँ&lt;br /&gt;यह सदी पत्थर-सी है संवेदनाओं के ख़िलाफ़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामने हालात की लाएँ जो काली सूरतें&lt;br /&gt;हैं कई अख़बार भी उन सूचनाओं के ख़िलाफ़ (पृ. 44)&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;फ़स्ल बेशक आप सारी अपने घर ले जाइए&lt;br /&gt;चंद दाने मेरे हिस्से के मुझे दे जाइए (पृ.41)&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन ग़ज़लों मे‍ बिना किसी आवेश या आयोजन भंगिमा के उन तमाम शोषित-उपेक्षित लोगों की की जीवन-दशा और अनुभव संसार को अपनेपन के साथ समेटा गया है और यह भी कि यह हमे‍ अपने शहर से रूबरू होने का अहसास दिलाता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो सूरज हर जगह सुंदर-सुनहरी धूप देता है&lt;br /&gt;वो सूरज क्यों हमारे शहर में अक्सर नहीं आता (पृ.40)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने संयत स्वर और सहज मुहावरे वाली सादगी से अनुप्राणित ये ग़ज़लें आजके दौर की मौजूदा व्यवस्था पर व्यंग्य करती हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुई हैं मुद्दतें आंगन में वो नहीं उतरी&lt;br /&gt;यों धूप रोज़ ठहरती है सायबानों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगह कोई जहाँ सर हम छुपा सकें अपना&lt;br /&gt;अभी भी ढूँढते फिरते हैं संविधानों में (पृ.56)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ज़लकार की चिंता यही है कि :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है आज भी वहीं का वहीं आम आदमी&lt;br /&gt;किस बात पर मुखर है ये संसद न पूछिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये ग़ज़लें प्रतिरोध के स्वभव को शक्ति -संपन्न करती हैं असुर विकलांग विकास की कलई खोलती हैं।&lt;br /&gt;ग़ज़लकार की चाह भी यही है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो परिवर्तन &lt;br /&gt;बदलें आसन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन ख़ाली हैं&lt;br /&gt;लब जन-गण-(पृ.70-71)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसिद्ध कथाकार और ग़ज़लकार ज्ञानप्रकाश विवेक इस संग्रह के विषय में‍ लिखते हैं कि "ये ग़ज़लें हमारे समय की नुमाया आवाज़ हैं। संग्रह की ग़ज़लें हार्दिकता के साथ मानवीय पक्ष प्रस्तुत करते हुए, मनुष्य और उसकी गरिमा की पैरवी करती हैं...जिन्हें ‘द्विज’ जैसे दयानतदार शायर ने अपनी संपूर्ण चेतना के साथ रचा है। "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्विज की ग़ज़लें क्लेवर में छोटी हैं पर अपने भाव संवेदन,अर्थ-परिधि और व्यंजना में गहरा असर छोड़ती हैं। सीधे मर्म तक पहुँचने वाली ये ग़ज़लें धुंध में लिपटे समय की सच्चाइयों से साक्षात्कार कराती हैं। सामान्य जन के भीतर के भाव लोक और उसके साथ होने वाली नाइंसाफ़ियों सौर बुरे बरतावों तथा समय की विद्रूपताओं को व्यंजित करती हुई ये ग़ज़लें बेबाक और पुरासर अंदाज़ में अपनी बात कहती हैं।&lt;br /&gt;भाषाई स्तर पर द्विजेन्द्र ‘द्विज’ को ‘दुष्यन्त-कुल’ का ग़ज़लकार कहा जाता है। जो हिन्दी और उर्दू के बीच संतुलन कायम करते हुए सादगी और सहजता को अपनी बानगी बना लेते हैं। उनके संवेदनात्मक उद्देश्य में निहित ईमानदारी और बयान की साफ़गोई भीतर तक वह चोट करती है जिसे पा कर पाठक को सुकून मिलता है। संग्रह की भूमिका में ख्यातनाम ग़ज़लगो ज़हीर कुरैशी उनकी ग़ज़लों को हिन्दोस्तानी  ठाठ की ग़ज़लें बताते हुए कहते है: ‘द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लों में एक विशेष किस्म की आंतरिकता,समझ , सलाहियत सूक्षम्ता और सघनता को महसूस किया जा सकता है।... कुल मिलाकर उनकी ग़ज़लें प्रगतिशील और जनवादी चेतना से लैस जागरूक ग़ज़लें हैं जो कोम्पलों की शैली में पल्लवित होती हैं। (पृ.9)&lt;br /&gt;वस्तुत: द्विजेन्द्र द्विज उन ग़ज़लकारों में से हैं जिनके अन्दर बाहर की घटनाओं के कारण&lt;br /&gt;निरंतर कुछ घटता रहता है और जिसे वे अपने साथ अपने शे’रों के माध्यम से तुरंत बाँटना चाहते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुड़ेंगी सीधे कहीं ज़िंदगी से ये जाकर&lt;br /&gt;भले ही ख़ुश्क हैं ग़ज़लें ये गुनगुनाने में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ज़ल में शे’र ही कहना है ‘द्विज’, हुनरमंदी&lt;br /&gt;नया तो कुछ भी नहीं क़ाफ़िए उठाने में (पृ.67)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये ग़ज़लें अपनी संप्रेषणीयता में सहज किन्तु असाधारण, असरदार और अपने ‘समय की पागल हवाओं के ख़िलाफ़’ नई इबारत लिखती हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िरी पत्ते ने बेशक चूम ली आख़िर ज़मीन&lt;br /&gt;पर लड़ा वो शान से पागल हवाओं के ख़िलाफ़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार : डा. कौशल नाथ उपाध्याय के संपादन में जोधपुर से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सेतु’ (अक्टूबर-नवंबर-2008)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-5639010625015994998?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/5639010625015994998/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/5639010625015994998'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/5639010625015994998'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='द्विजेन्द्र द्विज के ‘जन-गण-मन’ पर प्रसिद्ध समालोचक कैलाश कौशल की समीक्षा'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-3936526544040827666</id><published>2010-01-13T02:05:00.000-08:00</published><updated>2010-01-13T02:08:13.912-08:00</updated><title type='text'>द्विजेंद्र ‘द्विज’ पर मशहूर शायर और अतिथि-सम्पादक ‘फ़िक्रो-फ़न’ सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ शिमलवी</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;एक ताबनाक चिंगारी&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौजवान नस्ल के आतिशख़ाना से जो चिंगारियाँ निकल रही हैं, उनमें से एक निहायत ताबनाक (ज्योतिर्मयी) चिंगारी का नाम है द्विजेंद्र ‘द्विज’. अपनी इनफ़रादी (मौलिक) सोच और लबो-लहज़ा (कहन, कहने का ढँग) के सबब वो दूसरों से अलग नज़र आते हैं. उनके क़लाम में फ़िक्रो-अहसास की ताज़गी, अस्रे-हाज़िर (वर्तमान समय) के हालात की अक्कासी, इन्सानी दोस्ती का जज़्बा ख़ास तौर पर नुमायाँ है. वो अपने मुशाहदात (पर्यवेक्षण) तजरिबात(प्रयोग) और अहसासात(अनुभवों) को दिल की आँच में तपाकर निहायत पुरदर्द , पुरसोज़ और पुरअसर अंदाज़ में लफ़्ज़ों में पिरोते हैं. उनका फ़न(कला) मआनवीयत(अर्थपूर्णता), गहराई , सेहतमंदी और साफ़गोई (स्पष्टवादिता) का हामिल(पक्षधर) है. ख़ौफ़ो-हिरास (भय और त्रास) की धूल में लिपटा हुआ इंसान उनके अश’आर में बसा हुआ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;‘&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;द्विज’&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;ने ख़ुद को हमेशा असरी ज़िन्दगी (प्रभावी जीवन)के नज़दीक रखा है. वो अपने बेअमाँ(असुरक्षित) और बेदरमाँ(ला-इलाज) अह्द के मआशी(जीविका संबंधी) और मुआशरती इंतिशार (सह-अस्तित्व के बिखराव) और उसकी नफ़्सियाती(मनोवैज्ञानिक) और माद्दी (भौतिक)परीशानियों से आगाह हैं . वो अहद कि जिसमें पुरानी क़द्रों (मूल्यों)को ग्रहण लग चुका है और ज़ाती मफ़ादात(व्यक्तिगत लाभ) के लिए अख़लाक(चरित्र) और मरव्वत(संवेदना) को बाला-ए-ताक़ दिया गया है, उसकी खुलकर मज़म्मत(निंदा) करते हैं. उन्हें एक साफ़-सुथरे मुआशरे(समाज)की तलाश है. वो अम्नो-मुसावात(शांति और समानता) , भाईचारगी, फ़िरक़ावाराना-हमआहंगी (सांप्रदायिक सद्भाव) और जम्हूरी क़द्रों (लोकतांत्रिक मूल्यों) की बहाली के ख़्वाब देखते हैं और जब इन ख़्वाबों पर ज़र्ब पड़ती है तो उनकी शे’री सोच पर तल्ख़ी के अक़्स उभर आते हैं,लेकिन उनकी तल्ख़ी कड़वाहट में नहीं बदलती. वो ज़ख़्म-ख़ुर्दा(ज़ख़्म खाए हुए) हैं, मगर दिल-शिकस्ता नहीं. मायूसियों के सैलाब में भी अज़्मो-इस्तिकलाल(स्वाबलंबन का प्रण) रखते हैं. मताए-ख़ुदी(आत्म-सम्मान की दौलत)को हमेशा बरक़रार रखने में उनका यक़ीन है, जो उनकी ख़ुद्दार तबीयत का ग़म्माज़ है(परिचायक) . बिँधती हुई उँगलियों के बावजूद वो ज़िंदगी की क़मीज़ के टूटे हुए बटनों को टाँकने में मसरूफ़ हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘द्विज’ की शायरी ग़ैर-ज़रूरी सन्नाई(अनावश्यक कला-कर्म) से आरी (स्वतंत्र)है. ज़बान और लहज़ा नामानूस(अपरिचित) और मुबहम(अस्पष्ट) नहीं. उस्लूब(शैली) सादा, सलीस और आमफ़हम है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे हक़ीर ख़याल में एक अच्छे शे’र की अहम पहचान यही है कि वो सच्चा हो. ‘द्विज’ बज़ाते-ख़ुद सरापा महब्बत हैं और एक सच्चे इन्सान. उनका सुख-दुख भी सच्चा है. यही वजह है कि उनके शे’र सच्चे लगते हैं. वो दिन दूर नहीं कि जब अपनी इनफ़रादी(मौलिक) आन-बान और सच्चाई के बाइस(कारण) उनकी आवाज़ ग़ज़ल की भीड़ में दूर से पहचानी जाएगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ शिमलवी&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;15 जनवरी,2003. शिमला&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-3936526544040827666?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/3936526544040827666/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/3936526544040827666'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/3936526544040827666'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='द्विजेंद्र ‘द्विज’ पर मशहूर शायर और अतिथि-सम्पादक ‘फ़िक्रो-फ़न’ सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ शिमलवी'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-4313478124975057753</id><published>2010-01-09T02:44:00.000-08:00</published><updated>2010-01-09T02:55:57.045-08:00</updated><title type='text'>Dr.P.K. Sharma on Dwijendra Dwij's "JAN-GAN-MAN"  in Poet-Crit (International)July-Aug 2004</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;"Jan-gan-man"&lt;/span&gt; as the title indicates is essentially poet's encounter with the world as he finds it. It would not be off the point to call them 'protest poems' if we can give this generalised description.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Each `ghazal' is born out of experience (real or virtual) and therefore, has an immediacy of effect.it comes as the poet's authentic voice. Obviously this kind of poetry tends to settle into satire since it is directed at socio-politico-econimic disorder in the society. Poet's consciousness is continuously battling with the chaos,cruelty and hypocrisy that is so pervasive all around. The good thing about these ghazals is that satire is controlled and well directed.it is not vitriolic in character.The poet uses his anger creatively against the rottenness in the system.&lt;br /&gt;I only wish the poet should not stay with the protest mode. He has to go beyond where his quarrels start with himself and he looks at the world through the crystal of lhis unified vision.W.B. yeats has aptly remarked that out of quarrel with the world comes rhetoric and out of quarrel with oneself comes poetry. I see these poems not only his quarrel with the world but also with himself. Best things are born out of thi battling of the soul.&lt;br /&gt;I do not understand much about the discipline of ghazal as genre. But these do have telling effect on the reader, particularly if these are read aloud. As the review writer in the book has pointed out, poets language is Hindustani which, I think,has come to stay in literature though some purists might feel a little uneasy about it.&lt;br /&gt;Dwij's poetry has a ring of total sincerity about it and it cannot be accused of any false note.I wish some of the ghazals could be set to song and music to get the best out of them.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;Courtesy : Poet-Crit (International)July-Aug 2004&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-4313478124975057753?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/4313478124975057753/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/01/drpk-sharma-on-dwijendra-dwijs-jan-gan.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/4313478124975057753'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/4313478124975057753'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2010/01/drpk-sharma-on-dwijendra-dwijs-jan-gan.html' title='Dr.P.K. Sharma on Dwijendra Dwij&apos;s &quot;JAN-GAN-MAN&quot;  in Poet-Crit (International)July-Aug 2004'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-6045844711613760924</id><published>2008-11-14T02:49:00.000-08:00</published><updated>2008-11-14T02:52:31.209-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;'जन-गण-मन' पर प्रख्यात शायर  डा० शबाब ललित :&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;दायित्व बोध को झंकृत करती ग़ज़लें— डा० शबाब ललित&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जन-गण-मन' युवा कवि &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;द्विजेन्द्र 'द्विज'&lt;/span&gt; की छ्प्पन ग़ज़लों का अनुपम संग्रह है । 'द्विज' के पिता स्वर्गीय मनोहर शर्मा 'साग़र' पालमपुरी उर्दू और पहाड़ी काव्य के मैदान के सुप्रसिद्ध शह सवार थे । स्पष्ट है कि 'द्विज' का लालन—पालन एक सुलझे हुए साहित्य प्रेमी घराने में हुआ और उसके व्यक्तित्व एवं संस्कारों का ख़मीर विशुद्ध साहित्यिक माहौल की छाया में उठा ।&lt;br /&gt;'द्विज' पर्वतवासी हैं ।  उनके बचपन और यौवन के माहो-साल पर्वत के रम्य , रुचिकर और प्रेम पोषक मंज़रों की गोद में बीते जहाँ  क़दम-क़दम पर रूप का जादू, और रोमांस का माधुर्य मन को गुदगुदाता है। ऐसे माहौल में बढ़े-पले शायर के कलम से यद्यपि मैंहदी  की तिलिस्मी सुगंध और ठण्डे चश्मों की लहरों के कोमल स्पर्श का एहसास जागना स्वाभविक एवं अपेक्षित था परंतु 'द्विज' की रचनाओं में इस एहसास की जगह यथार्थ के निश्तर की काट अधिक नुमायाँ है । ऐसा लगता है कि फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' की मशहूरे-ज़माना काव्य पँक्ति—'और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा'—ने 'द्विज' की काव्य यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया है। 'जन-गण-मन' का कवि सपनों के विलास महल में चैन की बाँसुरी बजाने के बजाए यथार्थ की संगलाख़ चट्टानों की तपिश भोगता और इस ऊष्णता से पसीने में नहाए आम आदमी के दुख, दर्द एवं यातना को बाँटता कलमकार है । पर्वत के आम आदमी की ज़िन्दगी उसके लिए खुली किताब है। वह स्वयं यह सच्चाई स्वीकार करता है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;'ये मनोरंजन नहीं करती&lt;br /&gt;क्योंकि ये ग़ज़लें व्यथाएँ हैं।'&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अत: उसके शेरों में जिस जग बीती का उल्लेख है वह उसकी आपबीती भी है। ग़ज़ल के माध्यम से 'द्विज' ने इस विशाल भारत भूखण्ड की बहुसंख्यक जनता की ,जो ग़रीबी रेखा से नीचे गुज़र-बसर कर रही है, आकांक्षाओं, उत्कंठाओं , समस्याओं और पीड़ाओं को वाणी दी है। जब आम आदमी की संवेदनाओं के प्रति जन प्रतिनिधियों की उदासीनता और स्वार्थी वृत्ति से  उसका कवि हृदय संतप्त एवं आन्दोलित होता है तो झुंझला कर अपने शेरों को व्यंग्य वाण बना लेता है। निर्धनता,बेरोज़गारी और अभावों की व्यथा शायर की नींद हराम कर देती है जिनके सर छुपाने को छत नहीं और जो भूख और बदहाली से परेशान हैं । तब 'द्विज' कह उठता है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;'भूख है तो मरो भूख से&lt;br /&gt;ऐसे भी हल निकाले गये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'देख, ऐसे सवाल रहने दे&lt;br /&gt;बेघरों का ख़याल रहने दे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनके होने का कुछ भरम तो रहे&lt;br /&gt;इनपे इतनी तो खाल रहने दे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूल जाएँ न बिन तेरे जीना&lt;br /&gt;बस्तियों में बवाल रहने दे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;ना—बराबरी,धन और सुविधाओं की न्याय—असंगत बाँट, पूँजीपतियों और राजनेताओं की साज़िशी मिलीभगत, काले धन के ख़ुदाओं और बाहुबली अपराधी तब्के की सीनाज़ोरी, अत्याचार,अंधेरगर्दी और ला—क़ानूनी को देखकर कवि का मन तड़प उठता है तो 'जन-गण-मन' के प्रवक्ता कवि के अधरों पर मन का उबाल यों आता है:&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;'टूटे      छप्पर, &lt;br /&gt;सर पर   सावन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्वासित    है&lt;br /&gt;क्यों 'जन-गण-मन'?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों खलनायक&lt;br /&gt;का अभिनंदन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;सारी गर्मी कुछ लोगों ने भर ली अपने झोलों में&lt;br /&gt;अपने हिस्से में आई है ले देकर  बर्फ़ानी  रात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खोदता है वो खाइयाँ अक्सर&lt;br /&gt;लोग कहते हैं पुल बनाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घाट था सबके लिए फिर भी न जाने क्यों वहाँ&lt;br /&gt;कुछ प्रतिष्ठित लोग ही चुन-चुन के नहलाए गए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;खाई को पुल बनाने और बताने वाले पाखंडियॊं के ढोल का पोल खोलते हुए कवि यथार्थ  से पर्दा उठाता है और कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;वो अपने आप को कहते हैं मील के पत्थर&lt;br /&gt;मुसाफ़िरों को वो रस्ता सही नहीं देते ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बयान अम्न के खेतों में आग के गोले&lt;br /&gt;समझ में आई नहीं बात दोग़ली बाबा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँख मूँदे जिस डगर पर आपके पीछे चले&lt;br /&gt;आँख खोली तो यह जाना यह सड़क तो खाई है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;यह अनासिर(तत्व) जन गण को धर्म,भाषा ,जाति-पाँति के नाम पर तो कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर भिड़ा कर अपना उल्लू सीधा करते हैं तो कवि आम नागरिक को सचेत करने के साथ-साथ इन 'गंदुम नुमा, जौ फ़िरोश' मक्कारों से बरगला कहता है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;'तुम्हारे ख़्वाब की जन्नत में मंदिर और मस्जिद हैं&lt;br /&gt;हमारे ख़्वाब में 'द्विज' सिर्फ़ रोटी-दाल बसते हैं।'&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc9933;"&gt;'बने हैं पढ़ के जिसे आज वो वली बाबा !&lt;br /&gt;किताब आज वो हमने भी बाँच ली बाबा !'&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इन स्वार्थी शातिरों को वह जनता के मन के उबाल और आक्रोश से आगाह करता हुआ चेतावनी देता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;स्वार्थों के रास्ते चल कर&lt;br /&gt;डगमगाती आस्थाएँ हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूल हैं हाथों में लोगों के&lt;br /&gt;पर दिलों में बद्दुआएँ है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुप्पियाँ जिस दिन ख़बतर हो जाएँगी&lt;br /&gt;हस्तियाँ सब दर-ब-दर हो जाएँगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;जिस राजतंत्र में जन सेवा के नाम पर जन शोषण और राजनीति के ठेके द्वारा लूट जारी हो वहाँ दिन पलटने की यह आस बनाए रखना गनीमत है क्यों कि आशा ही जीवन का अवलंब है और इसी आशा के बलबूते पर ही कवि जनता और देश के दुश्मनों से कहता है:&lt;br /&gt;'द्विज' की ग़ज़ल की शैली सरल और स्पष्ट है । उर्दू के तथाकथित 'जदीद' शायरों की भाँति वह पाठक को अजनबी बिम्बों और उलझे-धुँधले प्रतीकों की भूल-भुलैयाँ में नहीं डालते। न ही वह कठिन शब्दावली का प्रयोग करके अपनी विद्वता का सिक्का जमाने और पाठक को शब्दकोश खोल कर शे'र समझने पर मजबूर करते हैं, न पेचीदा संधिबद्ध वाक्यों से अपने शेरों को बोझिल बनाते हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'द्विज' की ग़ज़ल में उर्दू-हिन्दी शब्दावली का सुन्दर और सटीक मिश्रण मन को मोहता है और शेरों की प्रभाव-क्षमता में इज़ाफ़ा करता है। उसकी ग़ज़ल समकालीन चुनौतियों और नये सरोकारों की प्रतिक्रिया  ही है और माँगपूर्ति भी और सचमुच ही जन-गण-मन का प्रतिबिम्ब भी। यह जनमानस की स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक, सांसारिक समस्याओं, चिंताओं, बाधाओं, और निराशाओं को दर्पण दिखाती रचनाएँ हैं जो साम्प्रदायिकता,संकुचित निजी स्वार्थों,लूट-खसूट,भ्रष्टाचार और अपराधिक वृत्ति से ग्रस्त तथा दूषित राजनैतिक माहौल पर खुल कर प्रहार करती हैं ।&lt;br /&gt;कवि कहीं भी निजी स्वार्थ या अवसरवादिता के प्रभाव में आकर सत्यवादिता से पीछे हटता नहीं दिखता । उसका उद्घोष है:&lt;br /&gt;आपका हर शब्द इक तहरीक होना चाहिए&lt;br /&gt;साथियो ! वक्तव्य को निर्भीक होना चाहिए&lt;br /&gt;'द्विज' का यह ग़ज़ल संकलन आम इंसान के ज़ख़्मों का जलूस है जिसकी बाबत उसने स्वयं कहा है:&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अपने दिल के ज़ख़्मों-सी&lt;br /&gt;काग़ज़ पर फुलवारी कर&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;पुस्तक ख़ूबसूरत छपी है और कम्प्यूटिंग की ग़लतियों से पाक है। द्विज की यह बुलंद पाया कृति जन—गण—मन की गहन तवज्जुह की हक़दार है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिमप्रस्थ (अगस्त,२००३) से साभार&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-6045844711613760924?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/6045844711613760924/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2008/11/blog-post_14.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/6045844711613760924'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/6045844711613760924'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2008/11/blog-post_14.html' title=''/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-3121642171554369358</id><published>2008-11-08T05:21:00.001-08:00</published><updated>2008-11-09T22:00:19.073-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ग़ज़लकार, समीक्षक बृज किशोर वर्मा 'शैदी'ने जन-गण-मन की समीक्षा मे लिखा है:&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अँग्रेज़ी के प्राध्यापक, मारण्डा (काँगड़ा) निवासी &lt;a href="http://kavitakosh.org/dwij.htm"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;श्री द्विजेन्द्र 'द्विज'&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;की ५६ ग़ज़लों का यह प्रथम संग्रह 'जन-गण-मन' कई मायनों में विशिष्ट है। परिपाटी से हट कर संग्रह का शीर्षक, वैसा ही असामान्य तख़ल्लुस(उपनाम) और कवि परिचय व आत्म-कथ्य का अभाव थोड़ा चौंकाते है। वैसी ही चौंकाने वाली है ग़ज़लों की स्तरीयता, जो बाज़ार में उपलब्ध ढेरों ग़ज़ल-संग्रहों में दुर्लभ से दुर्लभ होती जा रही है। 'जन-गण-मन' को समर्पित इस संग्रह की सभी ग़ज़लें जन—गण के मन का आईना हैं। चुप्पियों का अहसास, शोर की बकवास, मन का संत्रास, समय का उपहास,चटकती आस, भटकती प्यास और इन सब के बावजूद कवि का आत्मविश्वास रचनाओं में बड़े ही प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त हुए हैं।&lt;br /&gt;नये रूपकों-मुहावरों-बिंबों का प्रयोग ताज़ा हवा के झोंकों-सी अनुभूति देता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'जब से काँटों की तिजारत ही फली-फूली है&lt;br /&gt;कोई मिलता ही नहीं फूल खिलाने वाला'&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;```````````````&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;इस युग में हो गया है चलन 'बोनसाई' का&lt;br /&gt;यारो ! किसी भी पेड़ का अब क़द न पूछिये &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;`````````````````&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc9933;"&gt;एकलव्यों को रखेगा वो हमेशा ताक़ पर&lt;br /&gt;पाण्डवों या कौरवों को दाखिला दे जाएगा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस संग्रह की सभी ग़ज़लों की विशेषता यही है कि छंद में कहीं झोल नहीं है,जैसाकि अक्सर बड़े-बड़े रचनाकारों के यहाँ भी देखने को मिल जाता है। 'भाषा बहुत ही सरल किन्तु प्रभावपूर्ण है क्योंकि यह जन—गण के मन व जीवन से जुड़ी है।कवि के अपने ही शब्दों में:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;जुड़ेंगी सीधे कहीं ज़िन्दगी से ये जाकर&lt;br /&gt;भले ही ख़ुश्क हैं ग़ज़लें ये गुनगुनाने में।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रस्तुत संग्रह पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है पुस्तक में सम्मिलित ज़हीर कुरेशी व ज्ञानप्रकाशविवेक के कथन की पुष्टि ही करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;मसि-कागद(अंक—२१) [अक्तूबर-दिसंबर २००३] से साभार&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-3121642171554369358?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/3121642171554369358/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2008/11/blog-post_3645.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/3121642171554369358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/3121642171554369358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2008/11/blog-post_3645.html' title=''/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-5378536583833826696</id><published>2008-11-08T05:19:00.000-08:00</published><updated>2008-11-09T23:01:38.122-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff6600"&gt;प्रख्यात कवि डा० तारादत्त 'निर्विरोध' ने &lt;/font&gt;&lt;a href="http://kavitakosh.org/dwij.htm"&gt;&lt;font color="#ff6600"&gt;द्विजेन्द्र' द्विज' के ग़ज़ल संग्रह 'जन-गण-मन' &lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font color="#ff6600"&gt;की समीक्षा में लिखा है: &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी की वकालत करती ग़ज़लें : एक सार्थक प्रयास&lt;br /&gt;"सैंकड़ों हिन्दी ग़ज़लों से गुज़रते हुए काफ़ी अर्से बाद मुझे द्विजेन्द्र 'द्विज' की ग़ज़लों ने कहीं गहरे तक प्रभावित किया है और मैंने उनके पहले ग़ज़ल संग्रह 'जन-गण-मन' की सभी ग़ज़लों को आद्यंत पढ़ा । पुस्तक को पढ़ते समय तीन बातें उभर कर सामने आई हैं— इन ग़ज़लों के सभी शे'र बोलते हैं, कुछ कहते हैं,कुछ कहना चाहते हैं, अपनी मौलिकता दर्शाते हैं और गूँगे —बहरे नहीं हैं । दूसरी बात यह कि सभी शे'र समय सापेक्ष हैं, सीमा में रहते हुए भी बाहरी आक्रमणों का खुल कर विरोध करते हैं, किसी स्तर पर कोई समझौता नहीं करना चाहते और तीसरी बात यह है कि इन ग़ज़लों की सोच में आज का आदमी है। ग़ज़लकार की सारी वक़ालत उस 'बीच के आदमी" के लिए है जो भीतर और बाहर के आदमियों से संत्रस्त है,जिसे कालसर्प ने डँस लिया है या फिर उसका जीवम चक्र तोड़ दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ज़ल की पृष्ठ भूमि में न जाकर भावभूमि में विचरें तो लगता है "जन-गण-मन" की ५६ ग़ज़लों में ऐसा बहुत कुछ है जि हमारे दूर-पास है या फिर काल भ्रमित अँधेरों में डूबा हुआ कोई आदमी है जिसे वर्षों से अपनी पहचान की एक निरंतर तलाश है । ग़ज़लकार कहीं भी रहे, उसका दृष्टि विस्तार ऐसा है कि वह जीवन का कोना-कोना झाँक आया है। यही सब है आलोच्य कृति के कृतिकार द्विजेन्द्र 'द्विज' की ग़ज़लों के मूल में। उन्होंने ग़ज़ल के माध्यम से सिरधरों की दोग़ली नीतियों पर भी प्रहार किए हैं तो सामाजिक विद्रूपताओं के ख़िलाफ़ भी प्रश्न खड़े किए हैं और इन प्रहारों-प्रश्नों में जीवन का क्रूर सच उदघाटित होता नज़र आता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्वतों में जीता हुआ उनका ग़ज़लकार अपनी ज़मीन से अनजुड़ा नहीं है और विषम परिस्थितियों को भी दर्शाता है—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" ख़ुद तो ग़मों के ही रहे हैं आसमाँ पहाड़&lt;br /&gt;लेकिन ज़मीन पर हैं बहुत मेहरबाँ पहाड़ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैं तो बुलंद हैसलों के तर्जुमाँ पहाड़&lt;br /&gt;पर बेबसी के भी बने हैं कारवाँ पहाड़।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ज़लकार को उन सभी लोगों की बाख़ूबी पहचान है जो अपने सिवा किसी को नहीं जानते—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#33cc00"&gt;न भूलो, तुम ने ये उँचाइयाँ भी हमसे छीनी हैं&lt;br /&gt;हमारा क़द नहीं लेते तो आदमक़द नहीं होते &lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी हमें कब तक&lt;br /&gt;वहाँ भी तो बसेरे हैं जहाँ गुम्बद नहीं होते ।&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ज़लकार ने समय के ग़लत लोगों को आज के आदमी और उसकी क्षमता का भी आभास कराया है ताकि वे समय रहते अपने रास्ते बदल सकें:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#3333ff"&gt;"बंद कमरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम&lt;br /&gt;खिड़कियाँ हों हर जगह ऐसी दुआ लिखते हैं हम&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#993300"&gt;जो बिछाई जा रही हैं ज़िन्दगी की राह में&lt;br /&gt;उन सुरंगों से निकलता रास्ता लिखते हैं हम।&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किंतु विवशता यह है कि हम कितने ही चलें, चलते राहगीरों को भी रास्ते नहीं मिलते और लोग हैं कि न वे ख़ुदा से डरते हैं, न ख़ुदाई से और ही अपने आप से तभी तो ग़ज़लकार कहता है—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#996633"&gt;बराबर चल रहे हो और फिर भी घर नहीं आता&lt;br /&gt;तुम्हें यह सोच कर लोगो कभी क्या डर नहीं आता&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;तुम्हारे दिल सुलगने का यकीं कैसे हो लोगों को&lt;br /&gt;अगर सीने में शोला है तो क्यों बाहर नहीं आता ।"&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;स्थिति यह है कि सब कहीं अँधेरा व्याप्त है और मन की किरण किसी के साथ नहीं ।संग्रह के इस महत्वपूर्ण शे'र का यही मंतव्य और कथ्य है—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#ff6600"&gt;"जिन किताबों ने अँधेरों के सिवा कुछ न दिया&lt;br /&gt;है कोई उनको यहाँ आग लगाने वाला?"&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;ग़ज़लकार 'द्विज' ने थके हारे लोगों की थकानों को भी लिखा है तो पंख कटे आहत पक्षी जैसे आदमी की उड़ानों को भी—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#33cc00"&gt;"ढली है इस तरह ये ज़िन्दगी थकानों में&lt;br /&gt;यक़ीन ही न रहा अब हमें उड़ानों में &lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#ff6600"&gt;जगह कोई जहाँ सर हम छुपा सकें अपना&lt;br /&gt;अभी भी ढूँढते फिरते हैं संविधानों में ।"&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;दुरस्थिति यह है कि बात तो हम जन गण मन की करते हैं, किंतु यह भी सच है कि हम जहाँ थे वहीं रह गए हैं एक लंबी दूरी की अंतर्यात्राओं के बाद भी—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#993300"&gt;पृष्ठ तो इतिहास के जन-जन को दिखलाए गए&lt;br /&gt;ख़ास जो संदर्भ थे ज़बरन वो झुठलाए गए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;font color="#cc6600"&gt;घाट था सबके लिए पर फिर भी जाने क्यों वहाँ&lt;br /&gt;कुछ प्रतिष्ठित लोग ही चुन-चुन के नहलाए गए&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;जन गण मन की अवधारणा को सांकेतिक भाषा में व्यक्त करते हुए भी आलोच्य कृति की ग़ज़लें आने वाले समय से जोड़ती हैं वर्तमान और उसके अतीत को जिसमें कोई आगामी अतीत भी है और जिसका साक्षी है वह बीच का आदमी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहना चाहूँगा, "जन गण मन" ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लें उस विकल्पहीन आदमी के मन की सशक्त अभिव्यक्ति हैं जो मौन रहने के बजाए अपनी पैरवी करना ज़रूर चाहता है और बधाई देना चाहूँगा 'द्विज' जी को जिन्होंने भीड़ में घिरे रहने के बावजूद अपनी सोच और आवाज़ को बुलंद किया है।यह एक सार्थक प्रयास है आगामी सूर्य की अगुवानी के लिए।"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-5378536583833826696?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/5378536583833826696/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2008/11/blog-post_2871.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/5378536583833826696'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/5378536583833826696'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2008/11/blog-post_2871.html' title=''/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8125401994739105392.post-7353248760537223689</id><published>2008-09-29T00:29:00.000-07:00</published><updated>2008-10-15T05:30:35.084-07:00</updated><title type='text'>जन-गण-मन</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Ni8mKlrbvTM/SOCGUmvgXbI/AAAAAAAAABM/RrQinvGq4II/s1600-h/140px-Jan_gan_man.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5251344854069304754" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Ni8mKlrbvTM/SOCGUmvgXbI/AAAAAAAAABM/RrQinvGq4II/s400/140px-Jan_gan_man.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;द्विजेन्द्र ’द्विज’ के ग़ज़ल संग्रह ‘जन-गण-मन’ पर सुविख्यात ग़ज़लकार एवं छंद शास्त्री श्री आर.पी.शर्मा ‘महर्षि’ :&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;दुष्यंत-देवांश प्रकाशन, अशोक लाज, मारण्डा(हिमाचल प्रदेश) से प्रकाशित द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की ग़ज़लों का संग्रह जन-गण-मन पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ । इस पुस्तक में उनकी छप्पन ग़ज़लें संग्रहीत हैं,मानो ‘द्विज’ जी ने ठाकुर जी को लगाए ‘छप्पन भोग’ को प्रसाद के रूप में हमें बाँटा हो। ग़ज़लकार ज़हीर कुरेशी द्वारा लिखित इस संग्रह की विशद भूमिका से ज्ञात हुआ है कि ‘द्विज’ इसलिए भी उल्लेखनीय ग़ज़लगो हैं क्योंकि वे विगत तेईस वर्षों से मारंडा (पालमपुर),रोहड़ू, हमीरपुर,काँगड़ा और धर्मशाला जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करते हुए अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं,जहाँ वस्तुत: ग़ज़लगोई का कोई उत्साहवर्धक माहोल नहीं है। ज़हीर जी ने इस संबंध में एक मौके का शेर भी प्रस्तुत किया है:&lt;br /&gt;‘ये फूल सख़्त चट्टानों के बीच खिलते हैं&lt;br /&gt;ये वो नहीं जिन्हें माली की देखभाल लगे’&lt;br /&gt;पर्वतों, चट्टानों की बात बात आई तो द्विजेन्द्र जी का यह शेर भी दृष्टव्य है:&lt;br /&gt;‘पर्वतों जैसी व्यथाएँ हैं&lt;br /&gt;पत्थरों से प्रार्थनाएँ हैं’&lt;br /&gt;इस संग्रह की उनकी पहली ग़ज़ल भी पहाड़ों को ही समर्पित है,ग़ज़ल के सभी शेर अच्छे बन पड़े है, जिनमें से कुछ निम्नानुसार हैं:&lt;br /&gt;नदियों सरोवरों का भी होता कहाँ वजूद&lt;br /&gt;देते न बादलों को जो तर्ज़े-बयाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वो तो रहेगा खोदकर उनकी जड़े तमाम&lt;br /&gt;बेशक रहे हैं आदमी के सायबाँ पहाड़&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;कचरा व प्लास्टिक मिलें उपहार में इन्हें&lt;br /&gt;सैलानियों के ‘द्विज’ हुए हैं मेज़बाँ पहाड़’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;यहाँ प्रसंगवश हिमाचल के ख्याति प्राप्त शायर एवं ग़ज़लकार डा. शबाब ललित (शिमला) का एक शेर याद आ रहा है,जिसमें उन्होंने बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों का चित्रण कुछ इस प्रकार किया है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘तेरा पत्थर-सा दिल भी पिघल जाएगा&lt;br /&gt;प्यार की आँच इन बर्फ़ज़ारों में है’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार का उनका एक अन्य शेर भी है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;‘रास हम परदेसियों को आ गई&lt;br /&gt;पर्वतों की सर्द बर्फ़ीली हवा’&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;‘द्विज’ की ग़ज़लों में जहाँ भी हिन्दी-उर्दू शब्दों का मिश्रण हुआ है, समुचित अनुपात में हुआ है,जैसे—&lt;br /&gt;‘फ़रेबों की कहानी है तुम्हारे मापदंडों में&lt;br /&gt;वगरना हर जगह बौने कभी अंगद नहीं होते’&lt;br /&gt;‘अंगद’ यहाँ पौराणिक मिथक के रूप में शेर को और भी अर्थपूर्ण एवं व्यापक बना देता है,साथ ही यह अपनी संस्कृति से जुड़ने का परिचायक भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘द्विज’ ने् ग़ज़लों नए-नए शब्द और अर्थ देने का भी अच्छा प्रयास किया है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;‘रोज़ कितने ही उजालों का दहन होता है&lt;br /&gt;लोग कहते हैं यहाँ रोज़ हवन होता है’&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;‘रहे न व्यर्थ ही चुप ठूँठ बूढ़े पेड़ों के&lt;br /&gt;सुलग उठे वही दावानलों की भाषा में’&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;‘जो लड़ें जीवन की सब संभावनाओं के ख़िलाफ़&lt;br /&gt;हम हमेशा ही रहे उन भूमिकाओं के खिलाफ़’&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;‘आदमी से आदमी दीपक से दीपक दूर हों&lt;br /&gt;आजकी ग़ज़लें हैं ऐसी वर्जनाओं के ख़िलाफ़’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘पृष्ठ तो इतिहास के जन-जन को दिखलाए गए&lt;br /&gt;ख़ास जो संदर्भ थे केवल वो झुठलाए गए’&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;‘द्विज’ के कुछ बहुत ही मार्मिक शेर ये भी:&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;‘सूरज का एहतराम किया उसने उम्र भर&lt;br /&gt;जिसका कहीं भी धूप की बस्ती में घर न था’&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;‘अभागे लोग हैं कितने इसी संपन्न बस्ती में&lt;br /&gt;अभावों के जिन्हें हरपल भयानक साँप डसते हैं’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर् और मस्जिद के झगड़ों पर करारी चोट करते हुए ‘द्विज’ कहते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;“तुम्हारे ख़्बाब की जन्नत में मंदिर और मस्जिद हैं&lt;br /&gt;हमारे ख़्वाब में ‘द्विज’ सिर्फ़ रोटी —दाल बसते हैं’&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;‘द्विज’ की ग़ज़लों की भाषा गंगा-जमुनी है, वे दोनों ही भाषाओं को समान सम्मान देते हैं,उन्होंने अपनी ग़ज़लो में जहाँ उर्दू बहरों का प्रयोग किया है ,वहीं कुछ ग़ज़लें ऐसी भी हैं जो हिन्दी छंदों में कही गई हैं। जैसे:&lt;br /&gt;‘जीवन के हर मोड़ पर अब तो संदेहों का साया है&lt;br /&gt;नफ़रत की तहज़ीब ने अपना रंग अजब दिखलाया है&lt;br /&gt;ये पंक्तियाँ राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की निम्न्लिखित पंक्तियों की तर्ज़ पर हैं:&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;‘चारू चंद्र की चंचल किरणें ,खेल रही हैं जल-थल में&lt;br /&gt;स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अंबर तल में’&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;(मात्रिक समछंद ताटंक/लानवी,प्रति चरण सोलह: चौदह मात्राएँ। पर+अब= परब में संधि है तथा ’ने’&lt;br /&gt;लघु उच्चारित हो रहा है।)&lt;br /&gt;समग्र रूप में ‘द्विज’ की ग़ज़लें सुरुचिपूर्ण और समय की माँग के अनुसार हैं,पाठक उनकी ग़ज़लों को चाव से पढ़ेंगे,इसलिए कि,उनमें उन्हें भरपूर तग़ज़्ज़ुल मिलेगा। ग़ज़ल संग्रह पठनीय एवं संग्रहणीय है। उनकी लेखनी दिन—प्रति सशक्त हो! यही हमारी मंगल कामना है।&lt;br /&gt;मासिक साहित्य क्रांति—गुना (म.प्र). [अंक— दिसम्बर२००३] से साभार&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8125401994739105392-7353248760537223689?l=janganhman.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://janganhman.blogspot.com/feeds/7353248760537223689/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2008/09/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/7353248760537223689'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8125401994739105392/posts/default/7353248760537223689'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://janganhman.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='जन-गण-मन'/><author><name>जन-गण-मन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08946188447542768171</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-efm8I7Gl8jI/T0JE8Jl0GMI/AAAAAAAAAEg/ADO69xCEGHc/s220/janganman%2Btitle%2B001.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_Ni8mKlrbvTM/SOCGUmvgXbI/AAAAAAAAABM/RrQinvGq4II/s72-c/140px-Jan_gan_man.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry></feed>
